दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context७४ दोहावली कौसल्यामहिमा कौसल्या कल्यानमइ मूरति करत प्रनाम । सगुन सुमंगल काज सुभ कृपा करहिँ सियराम ॥२१२॥ भावार्थ—श्रीकौशल्याजी कल्याणमयी मूर्ति हैं, उन्हें प्रणाम करनेपर सब शुभ सगुन और सुन्दर मङ्गल होते हैं और सब कार्य सफल होते हैं तथा श्रीसीतारामजी कृपा करते हैं ॥२१२॥ सुमित्रामहिमा सुमिरि सुमित्रा नाम जग जे तिय लेहिं सनेम । सुअन लखन रिपुदवन से पावहिं पति पद प्रेम ॥२१३॥ भावार्थ—जगत्में जो स्त्रियाँ सुमित्राजीके नामको स्मरणकर [पातिव्रत] नियम लेती हैं, वे लक्ष्मण और शत्रुघ्न-जैसे पुत्र तथा पतिके चरणोंमें प्रेम प्राप्त करती हैं ॥२१३॥ सीतामहिमा सीता चरन प्रनाम करि सुमिरि सुनाम सुनेम । होहिं तीय पतिदेवता प्राननाथ प्रिय प्रेम ॥२१४॥ भावार्थ—भलीभाँति नियमपूर्वक श्रीसीताजीके चरणोंमें प्रणाम करनेसे और उनके सुन्दर नामका स्मरण करनेसे स्त्रियाँ पतिव्रता हो जाती हैं और अपने प्रिय प्राणनाथका प्रेम प्राप्त करती हैं ॥२१४॥ रामचरितकी पवित्रता तुलसी केवल कामतरु रामचरित आराम । कलितरु कपि निसिचर कहत हमहिं किए बिधि बाम ॥२१५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचरितरूपी बगीचेमें केवल कल्पवृक्ष ही हैं (अर्थात् उसमें केवल पुण्यपुरुषोंको ही