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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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दोहावली ७३ और सुग्रीवकी बड़ी प्रशंसा की और भरतजी भी उन्हें श्रीरामजीके समान समझकर ही उठकर उनसे मिले, तथापि वे ग्लानिसे गले ही जाते थे (मन-ही-मन सोचते थे कि कहाँ तो भरत-सरीखे निःस्वार्थ प्रेमी भाई और कहाँ हम अपने बड़े भाइयोंको मरवानेवाले स्वार्थी भाई !) ॥२०८॥ भरत स्याम तन राम सम सब गुन रूप निधान। सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान ॥२०९॥ भावार्थ—श्रीभरतजीका श्रीरामजीके समान ही श्याम शरीर है और उन्हींके समान वे रूप गुणके खजाने तथा सेवकोंको सुख देनेवाले हैं। इनका स्मरण करते ही सब कल्याण सहज ही मिल जाते हैं ॥२०९॥ लक्ष्मणमहिमा ललित लखन मूरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह। सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह ॥२१०॥ भावार्थ—जो सुख, सम्पत्ति, कीर्ति, विजय, सद्गुण और सुन्दर कल्याण के घर हैं, उन परम मनोहर श्रीलक्ष्मणजीकी मधुर मूर्तिका प्रेमसहित स्मरण करो ॥२१०॥ शत्रुघ्नमहिमा नाम सत्रुसूदन सुभग सुषमा सील निकेत। सेवत सुमिरत सुलभ सुख सकल सुमंगल देत ॥२११॥ भावार्थ—शोभा और शीलके धाम श्रीशत्रुघ्नजीके सुन्दर नामका भजन और स्मरण करनेसे सब सुख सुलभ हो जाते हैं और वह भजन स्मरण सब सुन्दर मङ्गलोंको देनेवाला है ॥२११॥