दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context७६ दोहावली पर यानी 'दशरथ' नामका जप करनेपर] उसमें पृथ्वी, घर, धन, धर्म, सद्गुणी और रूपनिधान पुत्र—इस प्रकार सभी कल्याणमय फल फलते हैं॥२१८॥ तुलसी जान्यो दसरथहिं धरमु न सत्य समान । रामु तजे जेहि लागि बिनु राम परिहरे प्रान ॥२१९॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि दशरथजीने ही इस तत्त्व- को समझा था कि सत्यके समान कोई भी धर्म नहीं है। जिस सत्यके लिये उन्होंने श्रीरामको त्याग दिया और श्रीरामके बिरहमें प्राण त्याग दिये ॥२१९॥ राम बिरहँ दसरथ मरन मुनि मन अगम सुमीचु । तुलसी मंगल मरन तरु सुचि सनेह जल सींचु ॥२२०॥ भावार्थ—श्रीरामजीके विरहमें दशरथजी मर गये, ऐसी शुभ मृत्यूतक मुनियोंके मन भी नहीं पहुँच सकते। तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसे मङ्गलमय मृत्युरूपी वृक्षको पवित्र (अनन्य और निष्काम) श्रीरामप्रेमरूपी जलसे सींचते रहो (अर्थात् श्रीराममें तुम्हारा प्रेम होगा तो तुम्हारी भी ऐसी ही दुर्लभ मृत्यु होगी) ॥२२०॥ सोरठा जीवन मरन सुनाम जैसें दसरथ राव को। जियत खिलाए राम राम बिरहँ तनु परिहरेउ ॥२२१॥ भावार्थ—जीवन और मृत्यु दोनोंमें ही जिस प्रकार महाराज दशरथजीका नाम हुआ (वैसा किसीके लिये भी सम्भव नहीं है)। जीवनकालमें उन्होंने भगवान श्रीरामको गोद खिलाया और शरीर छोड़ा तो श्रीरामके विरहमें ॥२२१॥