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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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दोहावली ७७ जटायुका भाग्य दोहा प्रभुहि बिलोकत गोद गत सिय हित घायल नीचु। तुलसी पाई गीधपति मुकुति मनोहर मीचु ॥१२२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गृध्रराज जटायुको धन्य हैं, जो सीताके [छुड़ाने] के लिये घायल हुए और नीच शरीर होनेपर भी प्रभुकी गोदमें उनके मधुर मुखारविन्दको निरखते हुए ही मनोहर मृत्यु और मुक्ति प्राप्त की ॥१२२॥ बिरत करम रत भगत मुनि सिद्ध ऊँच अरु नीचु। तुलसी सकल सिहात सुनि गीधराज की मीचु ॥१२३॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि गृध्रराजकी (इस प्रकार- की दुर्लभ) मृत्युका समाचार सुनकर विरक्त, कर्मयोगी, भक्त, ज्ञानी, मुनि, सिद्ध, ऊँच और नीच—सभी उनकी ईर्ष्या करने लगे (सबने चाहा कि हमें भी ऐसी ही मृत्यु मिले ॥१२३॥ मुए मरत मरिहैं सकल घरी पहरके बीचु। लही न काहूँ आजु लौं गीधराज की मीचु ॥१२४॥ भावार्थ—आजतक कितने मर गये, वर्तमानमें कितने मर रहे हैं और भविष्यमें घड़ी-पहरके अन्तरसे सभी मरेंगे ही; परंतु आजतक जटायुकी-सी सुन्दर मौत किसीने नहीं पायी ॥१२४॥ मुएँ मुकुत जीवत मुकुत मुकुत मुकुत हूँ बीचु। तुलसी सबही तें अधिक गीधराजकी मीचु ॥१२५॥ भावार्थ—कोई मरनेपर मुक्त होता है, कोई जीता ही मुक्त (जीवन्मुक्त) हो जाता है; मुक्त-मुक्तमें भी भेद होता है। तुलसी- CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri