दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context७८ दोहावली दासजी कहते हैं, इन सभी मुक्तियोंसे बढ़कर गृध्रराजकी मृत्यु हुई ॥२२५॥ रघुबर बिकल बिहंग लखि सो बिलोकि दोउ बीर । सिय सुधि कहि सिय राम कहि देह तजी अति धीर ॥२२६॥ भावार्थ—श्रीरघुनाथजीने [पीड़ासे] व्याकुल [घायल] जटायु- को देखा, उस धीरबुद्धि जटायुने भी दोनों भाइयोंको [नेत्र भरकर] देखा [देखते ही पीड़ामुक्त होकर] उन्हें सीताजीका समाचार सुनाकर, 'सीताराम', 'सीताराम' कहते हुए [और भगवान्को देखते हुए ही उनकी गोदमें] शरीर छोड़ दिया ॥२२६॥ दसरथ तें दसगुन भगति सहित तासु करि काजु । सोचत बंधु समेत प्रभु कृपासिंधु रघुराजु ॥२२७॥ भावार्थ—कृपाके समुद्र श्रीरघुनाथजीने अपने पिता दशरथजीसे दसगुनी भक्तिसहित उसका मृतकसंस्कार किया और भाई लक्ष्मणजी- सहित उसकी मृत्युके लिये शोक करने लगे ॥२२७॥ रामकृपाकी महत्ता केवट निसिचर बिहग मृग किए साधु सनमानि । तुलसी रघुबर की कृपा सकल सुमंगल खानि ॥२२८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी कृपा सब सुमङ्गलोंकी खान है; उस रामकृपाने केवट, राक्षस (विभीषण), पक्षी (जटायु) और पशुओं (बंदर-भालु आदि) को भी सम्मान देकर साधु बना दिया ॥२२८॥ हनुमत्स्मरणकी महत्ता मंजुल मंगल मोदमय मूरति मारुत पूत । सकल सिद्धि कर कमल तल सुमिरत रघुबर दूत ॥२२९॥