दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context८० दोहावली स्मरण करते ही स्मरण करनेवालेको सब सुख, सम्पत्ति, आनन्द और मङ्गल देनेवाले हैं ॥ २३३ ॥ बाहुपीड़ाकी शान्तिके लिये प्रार्थना तुलसी तनु सर सुख जलज भुज रुज गज बरजोर । दलत दयानिधि देखिऐ कपि केसरी किसोर* ॥२३४॥ भावार्थ—हे दयानिधान हनुमान्जी ! देखिये, तुलसीदासके शरीररूपी सरोवरके सुखरूपी कमलको यह भुजाका रोगरूप हाथी बलपूर्वक नष्ट कर रहा है। [इससे मुझको बचाइये; क्योंकि] आप केसरीनन्दन हैं (सिंहका* बच्चा ही मतवाले हाथीको परास्त कर सकता है) ॥ २३४ ॥ भुज तरु कोटर रोग अहि बरबस कियो प्रबेस । बिहगराज बाहन तुरत काढ़िअ मिटै कलेस ॥२३५॥ भावार्थ—मेरी भुजा पेड़के कोटरके समान है, उसमें रोगरूपी सर्प जबर्दस्ती घुस गया है। हे गरुड़वाहन हरि ! उसे आप शीघ्र निकाल डालिये, जिससे मेरा कष्ट दूर हो ॥ २३५ ॥ बाहु बिटप सुख बिहँग थलु लगी कुपीर कुआगि । रामकृपा जल सींचिऐ बेगि दीन हित लागि ॥२३६॥ भावार्थ—मेरा भुजारूपी वृक्ष सुखरूपी पक्षीका निवासस्थान था, उसमें दुष्ट रोगरूपी बुरी आग लग गयी है। हे हनुमान्जी ! शीघ्र ही इस दीनके भलेके लिये श्रीरामकृपारूपी जल सींचकर उस आगको बुझा दीजिये (क्योंकि रामकृपा आपके ही अधीन है) ॥ २३६ ॥ *तुलसीदासजीकी बाँहमें रोग हो गया था, श्रीहनुमान्जीकी स्तुतिसे वह अच्छा हो गया था। ये दोहे उसी प्रसङ्गके कहे जाते हैं। *केसरी हनुमान्जीके पिताका नाम था और केसरी सिंहको भी कहते हैं।