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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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दोहावली ८१ काशीमहिमा सोरठा मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानिकर। जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ॥२३७॥ भावार्थ—जहाँ भगवान् श्रीशिवजी और माता पार्वतीजी रहते हैं; उस काशीको पापोंको नष्ट करनेवाली, ज्ञानकी खान और मुक्तिको उत्पन्न करनेवाली जानकर क्यों न उसका सेवन किया जाय?॥२३७॥ शंकरमहिमा जरत सकल सुर वृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस ॥२३८॥ भावार्थ—जिस भयंकर विष [की ज्वाला] से सारे देवतागण जल रहे थे, उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन ! तू उन श्रीशिवजीको क्यों नहीं भजता ? उनके समान कृपालु [और] कौन है? ॥२३८॥ शंकरजीसे प्रार्थना दोहा बासर ढासनि के ढका रजनीं चहुँ दिसि चोर। संकर निज पुर राखिए चितै सुलोचन कोर ॥२३९॥ भावार्थ—दिनमें तो मुझे ठगोंके धक्के खाने पड़ते हैं और रातको मुझे चारों ओरसे चोर सताते हैं, अतएव हे शंकरजी ! कृपादृष्टि- की कोरसे मेरी ओर देखकर अपनी काशीपुरीमें इनसे मेरी रक्षा कीजिये ॥२३९॥

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