दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context८२ दोहावली अपनी बीसीँ आपुहीं पुरिहिँ लगाए हाथ । केहि बिधि बिनती बिस्व की करौं बिस्व के नाथ ॥२४०॥ भावार्थ—हे विश्वनाथजी! आपने अपनी 'बीसी'* में स्वयं अपनी पुरीमें कार्य आरम्भ कर दिया (संहारलीला शुरू कर दी), फिर मैं विश्वकी ओरसे किस प्रकार आपसे [उसकी रक्षाके लिये] विनय करूँ? ॥२४०॥ भगवल्लीलाकी दुर्ज्ञेयता और करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु । अति विचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥२४१॥ भावार्थ—अपराध करे कोई और और उसके फलका भोग पावे कोई और ही। भगवान्की लीला अति विचित्र है, उसे जानने योग्य जगत्में कौन है (अर्थात् कोई नहीं) ॥२४१॥ प्रेममें प्रपंच बाधक है प्रेम सरीर प्रपंच रुज उपजी अधिक उपाधि । तुलसी भली सुबैदई बेगि बाँधिए ब्याधि ॥२४२॥ भावार्थ—प्रेमरूपी शरीरमें यदि विषयासक्तिका रोग लग जाता है तो बड़ी भारी पीड़ा उत्पन्न हो जाती है। तुलसीदासजी कहते हैं कि अच्छी वैद्यता इसीमें है कि व्याधि को तुरंत रोक दिया जाय (यानी विषयासक्ति आने ही न दे) ॥२४२॥ अभिमान ही बन्धनका मूल है हम हमार आचार बड़ भूरि भार धरि सीस । हठि सठ परबस परत जिमि कीर कोल कृमि कीस ॥२४३॥ *विंशति—बीसी एक ग्रहदशा होती है। रुद्रकी बीसीमें संहार ही अधिक हुआ करता है। कहते हैं एक बार तुलसीदासजीके समयमें काशीमें बड़ी भारी महामारी फैल गयी थी। यह दोहा उसी समयका बतलाया जाता है।