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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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दोहावली ८३ भावार्थ—'हम बड़े हैं और हमारा आचार श्रेष्ठ है' ऐसे अभिमान- का भारी बोझ सिरपर रखकर मूर्खलोग तोते, रेशमके कीड़े और बंदरकी तरह बलात्कारसे पराधीन हो जाते हैं* ॥२४३॥ जीव और दर्पणके प्रतिबिम्बकी समानता केहिं मग प्रबिसति जाति केहिं कहु दरपन में छाँहँ । तुलसी ज्यों जग जीव गति करी जीव के नाहँ ॥२४४॥ भावार्थ—भला बतलाओ तो दर्पणमें छाया किस रास्तेसे घुसती है और किस रास्तेसे निकल जाती है ? 'तुलसीदासजी कहते हैं कि जीवोंके नाथ परमात्माने संसारमें जीवोंकी भी ऐसी ही चाल बनायी है (कौन किस रास्तेसे कहाँसे आता है और किस मार्गसे कहाँ चला जाता है, इस बातको कोई नहीं बतला सकता) ॥२४४॥ भगवन्मायाकी दुर्ज्ञेयता सुखसागर सुख नींद बस सपने सब करतार । माया मायानाथ की को जग जाननिहार ॥२४५॥ भावार्थ—सुखसागर परमात्मा ही जीवके रूपमें सुखकी नींद सो रहे हैं और स्वप्नवत् सब काम कर रहे हैं। मायाके स्वामीकी इस मायाको जाननेवाला जगत्में कौन है ? ॥२४५॥ *तोता फिरनेवाली लकड़ी पर बैठकर लकड़ी घूमते ही उलट जाता है और पंजोंसे लकड़ीको पकड़े रखकर अपनेको बँधा मानता है और पकड़ा जाता है । रेशमका कीड़ा आप ही कोश बनाकर उसमें बंध जाता है और मारा जाता है। इसी प्रकार बंदर छोटे मुँहकी हँड़ियामें चनेके लोभसे हाथ डालकर चने मुट्ठीमें भरकर मुट्ठी बंद कर लेता है, चनोंके लालचसे मुट्ठी खोलता नहीं और फलस्वरूप पकड़ा जाता है ।