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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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८४ दोहावली

जीवकी तीन दशाएँ

जीव सीव सम सुख सयन सपनेँ कछु करतूति । जागत दीन मलीन सोइ बिकल बिषाद बिभूति ॥२४६॥ भावार्थ—जीव सुखसे सोनेके समय (सुषुप्तिमें) शिव (परमात्मा) के समान है, स्वप्नमें कुछ कार्य करता है (अनेक प्रकारकी सृष्टि रचता है) और जागतेमें (जाग्रदवस्थामें) वही दीन-मलीन हो जाता है और विषाद (अनेक प्रकारके शोक) की सम्पत्ति (सामग्री) से व्याकुल रहता है ॥२४६॥

सृष्टि स्वप्नवत् है

सपने होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ । जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥२४७॥ भावार्थ—स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाता है और कंगाल इन्द्र हो जाता है। परंतु जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं होती। वैसे ही इस विषयरूप संसारको भी हृदयसे [स्वप्नवत्] देखो ॥२४७॥

हमारी मृत्यु प्रतिक्षण हो रही है

तुलसी देखत अनुभवत सुनत न समुझत नीच । चपरि चपेटे देत नित केस गहें कर मीच ॥२४८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि रे नीच ! हाथोंसे तेरी चोटी पकड़कर मृत्यु नित्य ही झपटकर तेरे चपत जमा रही है। यह दशा देखकर, सुनकर और अनुभव करके भी तू नहीं समझता [प्रतिक्षण शरीरका क्षय हो रहा है, यह देखते-सुनते हुए भी जीव अपनी मौतको भुलाकर विषय-सेवनमें ही लगा रहता है। उसीको चेतावनी देते हैं] ॥२४८॥

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