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दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

by गोस्वामी तुलसीदास

DevanagariHindipublished196 pages

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दोहावली ८५ कालकी करतूत करम खरी कर मोह थल अंक चराचर जाल । हनत गुनत गनि गुनि हनत जगत ज्योतिषी काल ॥२४९॥ भावार्थ—जगत्में कालरूपी ज्योतिषी हाथमें कर्मरूपी खड़िया लेकर मोहरूपी पट्टीपर चराचर जीवरूपी अङ्कोंको मिटाता है, हिसाब लगाता है, फिर गिन-गिनकर मिटाता है ॥ २४९ ॥ इन्द्रियोंकी सार्थकता कहिबे कहँ रसना रची सुनिबे कहँ किए कान । धरिबे कहँ चित हित सहित परमारथहि सुजान ॥२५०॥ भावार्थ—चतुर परमात्माने परमार्थ (भगवच्चर्चा) कहनेके लिये जीभ बनायी, भगवद्गुणानुवाद सुननेके लिये कान रचे और प्रेमसहित भगवान्‌का ध्यान धरनेके लिये चित्त बनाया ॥ २५० ॥ सगुणके बिना निर्गुणका निरूपण असम्भव है ग्यान कहै अग्यान बिनु तम बिनु कहै प्रकास । निरगुन कहै जो सगुन बिनु सो गुरु तुलसीदास ॥२५१॥ भावार्थ—जो अज्ञानका कथन किये बिना ज्ञानका प्रवचन करे, अन्धकारका ज्ञान कराये बिना ही प्रकाशका स्वरूप बतला दे और सगुणको समझाये बिना ही निर्गुणका निरूपण कर दे, तुलसीदासजी कहते हैं कि वह मेरा गुरु है (तात्पर्य यह है कि अज्ञानके बिना ज्ञान, अन्धकारके बिना प्रकाश और सगुणके बिना निर्गुणकी सिद्धि नहीं हो सकती; निर्गुण कहते ही सगुणकी सिद्धि हो जाती है। अतएव जो सगुणोपासना छोड़कर निर्गुणोपासना करना चाहते हैं, उनको यथार्थ निर्गुणतत्त्वका ज्ञान होना बहुत ही कठिन है) ॥ २५१ ॥