दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context८६ दोहावली निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार । खोएँ राखें आपु भल तुलसी चारु विचार ॥२५२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि निर्गुण ब्रह्म (१, २, ३) अङ्कके समान है और सगुण भगवान् अक्षर (एक, दो, तीन) के समान हैं; अब दोनों प्रकारोंको समझना चाहिये और फिर किसके न रखनेसे और किसके रखनेसे अपना कल्याण है, इस बातको भी भलीभाँति विचारना चाहिये (व्यापारी लोग हुंडीमें पहले अङ्कोंमें संख्या-जैसे १०००) लिखकर फिर अक्षरोंमें—'अखरे एक हजार' ऐसा लिख देते हैं। दोनों ही ठीक हैं, परंतु अक्षरोंमें लिख देनेसे न तो किसी तरह- का भ्रम रह सकता है और न एक शून्य घटा-बढ़ाकर कोई हजारको सौ या दस हजार ही बना सकता है। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण दोनों सत्य हैं, एक ही दो रूपोंमें हैं; परंतु निर्गुणकी अपेक्षा सगुण अधिक प्रामाणिक है। निर्गुणमें तो किसी तरहका भ्रम भी रह सकता है परंतु सगुणमें न तो कोई भ्रम रह सकता है और न किसी प्रकारसे कोई छल ही चल सकता है।) ॥२५२॥ विषयासक्तिका नाश हुए बिना ज्ञान अधूरा है परमारथ पहिचानि मति लसति बिषयँ लपटानि । निकसि चिता तें अधजरित मानहुँ सती परानि ॥२५३॥ भावार्थ—परमार्थ (सत्य वस्तु) की पहचान हो जानेपर भी विषयोंमें लिपटी हुई बुद्धि ऐसी लगती है, मानो चितासे निकलकर भागी हुई कोई अधजली सती हो ॥२५३॥