दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ८७ विषयासक्त साधुकी अपेक्षा वैराग्यवान् गृहस्थ अच्छा है सीस उघारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग । घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग ॥२५४॥ भावार्थ—अधजली भागनेवाली ऐसी सतीको सिर खोलनेके लिये किसने कहा था ? प्यारे सगे-सम्बन्धी तो सब रोक रहे थे । इससे तो यही अच्छा था कि स्वामीके वियोगकी अग्निमें सदा जला करती और घर बैठी ही सती कहलाती । (तात्पर्य यह है कि साधु होकर फिर विषयोंकी ओर ललचानेसे तो घर बैठे भजन करना ही अच्छा है ।)॥२५४॥ साधुके लिये पूर्ण त्यागकी आवश्यकता खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्यागि । कै खरिया मोहि मेलि कै बिमल बिबेक बिराग ॥२५५॥ भावार्थ—[कहते हैं कि साधु होनेके बाद तुलसीदासजीको एक दिन उनकी स्त्री मिल गयी । स्त्रीने उनकी झोलीमें खरी (सफेद गोपीचन्दन) और कपूर आदि देखकर कहा कि] हे प्रियतम ! जब आप अपनी झोलीमें खरी और कपूर आदि सब सामान रखते हैं, तब स्त्रीका त्याग उचित नहीं है । अतएव या तो मुझको भी इस झोलीमें डाल लीजिये, अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्यको धारण कीजिये । [कहते हैं कि उसी क्षणसे तुलसीदासजीने झोली-झंडा फेंक दिया । यह दोहा वास्तवमें सभी विरक्त-वेषधारी पुरुषोंके लिये चेतावनी- स्वरूप है] ॥२५५॥