भारतकोश
दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)

Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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८८ दोहावली भगवत्प्रेममें आसक्ति बाधक है, गृहस्थाश्रम नहीं घर कीन्हें घर जात है घर छांड़े घर जाइ । तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ ॥२५६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि घर करनेसे (गृहस्थीमें रहनेसे) अपना असली घर (परलोक) नष्ट हो जाता है और घर छोड़नेसे (संन्यास ग्रहण करनेसे) यहांका घर (गृहस्थी) नष्ट होता है । अतएव तू घर और वनके बीचमें ही (अर्थात् घरहीमें गृहत्यागी- की भाँति रहकर) श्रीरामजीके प्रेमकी पुरी बसा ॥२५६॥ संतोषपूर्वक घरमें रहना ही उत्तम है दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ । तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ ॥२५७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि संपत्ति शरीरकी छायाके समान है। इसकी पीठ देखकर चलनेसे यह पीछे-पीछे चलती है और सामने होकर चलनेसे दूर भाग जाती है। (जो धनसे मुंह मोड़ लेता है, धनकी नदी उसके पीछे-पीछे बहती चली आती है; और जो धनके लिये सदा ललचाता रहता है, उसे सपनेमें भी पैसा नहीं मिलता ।) इस बातको समझकर घर बैठकर ही दिन बिताओ (अर्थात् संतोषसे रहो और भगवान्का भजन करो ) ॥२५७॥ विषयोंकी आशा ही दुःखका मूल है तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम । सेयें सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम ॥२५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि आशादेवी नामकी एक अद्भुत देवी है; यह सेवा करनेपर तो शोक (दुःख) देती है और इससे विमुख होनेपर सुख मिलता है ॥२५८॥