भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] मूत्राघात-निदान २८१


समय रोगीके शरीरमें अश्मरी (पथरी) नामक रोग उत्पन्न हो जाता है। यह रोग बड़ा भयंकर होता है। जैसे गायका पित्त सूखकर गोरोचन बन जाता है, वैसे ही यह अश्मरी होती है। प्रायः सभी प्रकारकी पथरियाँ कफाश्रित ही होती हैं। इस रोगका पूर्वरक्षण इस प्रकार है—

इस रोगके होनेमें वस्तिभागमें अवरोध होता है अथवा उसके सन्निकट अन्य किसी भागमें भी हो सकता है। जिस भागमें होता है उस भागके चारों ओर अवयवोंमें अत्यधिक पीड़ा होती है। वस्तिभागमें मूत्रका अवरोध तथा उसकी कृच्छ्रता बनी रहती है। रोगीके मूत्रमें अजामूत्रके समान गन्ध, ज्वर और अरुचि होती है। इस रोगका सामान्य लक्षण तो यह है कि रोगीके नाभि-लिंगमणि और वस्तिके शिरोभागमें कष्ट रहता है। अश्मरीद्वारा मार्गावरोधके कारण वहाँ उस समय पर्याप्त भागमें मूत्र फैल जाता है। वह रुक-रुककर बाहर निकलता है। मूत्र निकलनेपर रोगीको सुखानुभूति होती है। उस मूत्रका वर्ण गोमेद या गोमूत्रके समान झलकता रहता है।

मूत्र-निर्गमनमें ऐसा प्रकोप हो जानेपर रक्त, मांस तथा धातु-प्रवाहके मार्गमें कष्ट होता है। वातजरोगसे व्यथित रोगी अपने दाँतोंको किटकिटाता हुआ काँपता है। मूत्रसे भरे हुए नाभिसे नीचे स्थित वस्तिभागको पकड़कर दबाता हुआ वह कराह उठता है। अपानवायुके सहित मल-पिण्ड उसके गुह्यभागसे निकलता है और बूँद-बूँद करके मूत्र टपका करता है। वातज दोषके कारण शरीरमें उत्पन्न हुई अश्मरीरोगका वर्ण श्याम है। उसमें रूक्षता रहती है। देखनेमें वह काँटोंसे बिंधी हुई-सी प्रतीत होती है।

पित्तज दोषके कारण उत्पन्न इस अश्मरीरोगमें वस्तिभाग जलने लगता है। उसमें ऐसा प्रतीत होता है, जैसे अंदर-ही-अंदर कुछ पक रहा हो। इस पित्त-दोषजन्य अश्मरीका स्वरूप भल्लातक (भिलावेके बीज)-के समान होता है। इसका वर्ण लाल, पीला अथवा काला होता है।

कफजन्य अश्मरी होनेसे वस्तिभागमें पीड़ा होती है। उस स्थानमें भारीपन तथा शीतलताका अनुभव होता है। इस रोगमें उत्पन्न हुई अश्मरी आकारमें बड़ी, चिकनी, मधु (शहद) अथवा श्वेतवर्णा होती है। ये तीनों अश्मरी प्रायः बालकोंमें हुआ करती हैं। आश्रय, मृदुता और उपचयकी अल्पताके कारण बालकोंकी अश्मरी ग्रहण करके सुखपूर्वक निकाली जा सकती है।

शुक्रके वेगको रोकनेसे प्राणीके शरीरमें शुक्राश्मरी नामक भयंकर रोगकी उत्पत्ति होती है। जब धातु-प्रवाहिका नाड़ीसे गिरा हुआ अथवा कुपित वीर्य दोनों अण्डकोशोंके बीच रुक जाता है और लिंग-मार्गसे वह बाहर नहीं निकलता, तब वहाँ स्थित विकृत वायु विक्षुब्ध होकर उसको सुखा देता है, उसी दोषसे इस शुक्राश्मरीका जन्म होता है। इस रोगमें भी वस्तिभागमें पीड़ा होती है। रोगीको मूत्र³ निर्गत करनेमें कष्ट होता है। इसका भी वर्ण श्वेत माना गया है। इसके कारण मूत्रावरोध होनेसे तत्सम्बन्धी स्थानोंमें सूजन आ जाती है। अण्डकोष और उपस्थेन्द्रियके बीचमें हाथसे दबाया जाय तो वह विलीन हो जाती है। इस रोगके हो जानेपर रोगीको पीड़ा होती है, उसके दुष्प्रभावसे ज्वर हो जाता है, रोगीको खाँसी आने लगती है। इसी अश्मरीरोगके कारण रोगीके शरीरमें शर्करारोगका विकार भी उत्पन्न हो जाता है। यदि इसकी


१-वा०नि० ९, अ०हृ०नि०अ० ९। २-सु०नि०अ० ३, अ०हृ०नि०अ० ९।

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