गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 120, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ४ ॥ वह जो मुख से [ स्त्री को नहीं छूता ], उससे वह अग्नि को प्राप्त होने वालों के [ अर्थात् अग्निहोत्रादि विद्या जानने वालों के लोक को दिन दिन पाता है ]—३ । ( यत् हृदयेन तेन शूराणाम्—४ ) वह जो हृदय से [ स्त्री को नहीं छूता ], उससे वह शूरों के [ लोक को दिन दिन पाता है ]— । ( यत् उपस्थेन तेन गृहमेधिनाम्—५ ) वह जो उपस्थ इन्द्रिय से [ स्त्री को नहीं छूता ], उससे वह गृहस्थों के [ लोक को दिन दिन पाता है ]—५ । ( तैः चेत् स्त्रियं पराहरति अनग्निः इव शिष्यते । ) उन [ कर्मों ] से जो स्त्री को वह त्यागता है, अनग्नि [ आहवनीय गार्हपत्य और दाक्षिणात्य यज्ञ की अग्नियों को छोड़े हुये सन्यासी ] के समान वह उपदेश किया जाता है । ( सः यत् अहरहः आचार्य्याय कुले अनुतिष्ठते, सो अनुष्ठाय ब्रूयात्—धर्मगुप्तः मा गोपाय इति, गुप्तः धर्मः ह एनं गोपायती ) वह जो दिन दिन आचार्य के लिये गुरुकुल में कर्म करता है, वह कर्म करके कहे—धर्म से रक्षा किया गया तू मुझे बचा, रक्षा किया गया धर्म ही इस [ पुरुष ] को बचाता है, (तस्य ह प्रजा श्वः श्वः श्रेयसी श्रेयसी ह भवति, धाय्या एव प्रतिधीयते, स्वर्गे लोके पितॄन् निदधाति ) उसकी संतान कल कल [ अगले अगले दिन ] धार्मिक धार्मिक ही होती है, धाय्या [ होम में अग्नि प्रज्वलित करने का सामिधेनी मन्त्र ] ही रक्खा जाता है और वह स्वर्गलोक में पितरों [ पालने वाले विद्वानों ] को धरता है । ( तान्तवं न वसीत, यः तान्तवं वस्ते क्षत्रं वर्धते न ब्रह्म, तस्मात् तान्तवं न वसीत, ब्रह्म वर्धतां मा क्षत्रम् इति ) वह [ ब्रह्मचारी ] सूत का वस्त्र न पहिरे, जो सूत का वस्त्र पहिरता है क्षत्रियत्व को बढ़ाता है न वेदज्ञान को, इसलिये सूत का वस्त्र न पहिरे, [ जिससे ] वेदज्ञान बढ़े न क्षत्रियत्व । (उपरि न आसीत, यत् उपरि आस्ते तत् आत्मनः प्राणम् एव अधरं कुरुते यत् वातः वहति ) वह ऊपर न बैठे, जब ऊपर बैठता है तब अपने प्राणवायु को नीचा करता है जिसको पवन चलाता है । ( अधः एव आसीत, अधः शयीत, अधः तिष्ठेत्, अधः व्रजेत् ) वह नीचे बैठे, नीचे सोवे, नीचे खड़ा हो, नीचे चले, ( एवं ह स्म वै तत् ब्रह्मचर्य्यं पूर्वे ब्राह्मणाः चरन्ति, तं ह स्म तत् पुत्रं भ्रातरं वा उपतापिनम् आहुः ) इस प्रकार से निश्चय परिव्राजकानाम् । संन्यासिनाम् ( अग्निप्रस्कन्दिनाम् ) अग्नि + प्र + स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-णिनिः । अग्निप्रापकानाम् । अग्निहोतृगाम् (गृहमेधिनाम्) गृह + मिधृ मेधाहिंसनयोः संगमे च—णिनिः । गृहान् गृहव्यवहारान् मेधन्ति निश्चयेन जानन्ति ते गृहमेधिनः । गृहस्थानाम् ( पराहरति ) त्यजति ( अनग्निः ) नास्ति अग्नियंस्य । अग्निहोत्रादिकर्मशून्यः । संन्यासी—यथा मनुः ६ । ३८, ४३ (शिष्यते) शासु अनुशासने-कर्मणि लट् । अनुशासने क्रियते । उपदिश्यते । (कुले ) गुरुकुले । ब्रह्मचारिणां गृहे ( धर्मगुप्तः ) धर्मेण रक्षितः (गोपायति) रक्षति ( धाय्या ) पाय्यसान्नाय्यनिकाय्यधाय्या० ( पा० ३ । १ । १२६ ) दधातेः—ण्यत् । आतो युक् चिण्कृतोः ( पा० ७ । ३ । ३३ ) इति युक् । धीयते अनया समिदिति धाय्या । सामिधेनीनां मध्ये ऋग्विशेषः । अग्निप्रज्वलनमन्त्रः । ( प्रतिधीयते ) निश्चयेन स्थाप्यते ( तान्तवम् ) तन्तु-अण् । सूत्रेण सिद्धं वस्त्रम् ( उपतापिनम् )