गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ५ ॥ ८३ करके उस ब्रह्मचर्य्य को पहिले ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञानी ] करते थे, उस पुरुष को ही और उसके पुत्र और भाई को प्रतापी कहते हैं [ अर्थात् पूरा कुटुम्ब ब्रह्मचारी सहित ऐश्वर्य्यवान् होता है ] । ( उपनयेत एनम् इति ) वह [ आचार्य ] इस [ ब्रह्मचारी ] का उपनयन संस्कार करावे । ( आसमिद्धारात् स्वरेष्यन्तः अन्नम् अद्यात् अथ अह जघनम् आहुः ) समिधाओं [ हवन के लिये काष्ठ ] लाने से निवृत्त होकर सुख चाहने वाला वह [ ब्रह्मचारी ] अन्न खावे फिर प्रसन्न होकर [ उसको ] गतिशील [ पुरुषार्थी ] कहते हैं। ( स्नापयेत एनम् इति ) वह इस [ ब्रह्मचारी ] को [ विद्या में ] स्नान करावे । ( आसमिद्धारात् न हि एतानि व्रतानि भवन्ति ) [ केवल ] समिधा लाने से निवृत्त होकर ही यह व्रत नहीं होते हैं । (तं चेत् शयानम् आचार्यः अभिवदेत्, सः प्रतिसंहाय प्रतिशृणुयात् ) उस सोते हुए को जो आचार्य बुलावे, वह सामने जाकर आदर से सुने, (तं शयानं चेत् उत्थाय ) उस सोते हुए को जो [ वह बुलावे ], उठकर [ वह आदर से सुने ], ( तम् उपस्थितं चेत् अभिक्रम्य ) उस उठे हुए को जो [ वह बुलावे ] परिक्रमा करके [ वह आदर से सुने ], ( चेत् तम् अभिक्रान्तम् अभिपलायमानम् ) जो उस परिक्रमा करते हुये, भागते हुये को [ वह बुलावे, वैसा ही व्यवहार ब्रह्मचारी करे ] । ( एवं ह स्म वै तत् ब्रह्मचर्य्यम् पूर्वे ब्राह्मणाः चरन्ति तेषां ह स्म वा एषा पुण्या कीर्त्तिः गच्छति, आह, वै अयं सो अद्य गमिष्यति इति ) ऐसे ही निश्चय करके इस ब्रह्मचर्य को पहिले ब्राह्मण करते थे, उनकी ही निश्चय करके यह पुण्य कीर्ति चली आती है, ऐसा यह कहता है, [ वैसा ही ] निश्चय करके यह [ ब्रह्मचारी ] भी आज चलेगा ॥ ४ ॥ भावार्थः—जो ब्रह्मचारी विनय पूर्वक आचार्य से विद्या ग्रहण करते हैं वे कीर्ति पाते हैं ॥ ४ ॥ कण्डिका ५ ॥ जनमेज्यो ह वै पारीक्षितो मृगयाञ्चरिष्यन् हंसाभ्यामशिक्षदुपावतस्थ इति, तावूचतुर्जनमेजयं पारीक्षितमभ्याजगाम, स होवाच नमो वां भगवन्तो, कौ नु भगवन्ताविति, तावूचतुर्दक्षिणाग्निश्चाहवनीयश्चेति, स होवाच नमो वां भगवन्तो, तदाक्रीयतामिति होपाराममित्यपि किल देवा न रमन्ते न हि देवा न रमन्तेऽपि चैकोपारामाद्देवा आराममुपसंक्रामन्तीति स होवाच नमो वां भगवन्तो, किं पुण्य- प्रतापिनम् ( उपनयेत ) उपनयनेन संस्कुर्यात् ( आसमिद्धारात् ) समिध्+हरतेः- घञ् । समिधां होमकाष्ठानामानयनान्निवृत्तो भूत्वा ( स्वरेष्यन्तः ) स्वः-एष्यन्तः । जूविशिभ्यां झच् ( उ० ३ । १२६ ) स्वः+इष इच्छायाम्-झच्, आर्षो यकारः । सुखेच्छुकः ( जघनम् ) हन्तेः शरीरावयवे द्वे च ( उ० ५ । ३२ ) हन हिंसागत्योः—अच् । गतिशीलम् ( स्नापयेत् ) विद्यया स्नानं कारयेत् ( अभि- वदेत् ) आवाहनं कुर्यात् ( प्रतिसंहाय ) प्रति+सम्+ओहाङ् गतौ—ल्यप् । प्रत्यक्षं संगत्य । ( प्रतिशृणुयात् ) प्रतीत्या श्रवणं कुर्यात् । ( अभिक्रम्य ) परिक्रमेण दक्षिणीकरणेन प्राप्य ॥