गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ
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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ७ ॥ ८९ यदीदमृतुकाम्पा˙˙˙१, अघं रिप्रमुपेयिम अन्धः श्लोण इव हीयतां˙˙˙२, मा नोऽन्वा- गादघं यतः—इति ) जो वह [ मरघट में ] ठहरे, जल हाथ में करके--यदीदमृतुकाम्या ˙˙˙इस [ ब्राह्मण वचन ] को पढ़ करके जप करता हुआ मार्जन करके घूमे और समय [ आचार ] के लिए ऊपर जावे, यदीदमृतुकाम्या˙˙˙१, अघं रिप्रमुपेयिम अन्धः श्लोण इव हीयताम्˙˙˙२, मा नोऽन्वागादघं यतः˙˙˙इति ३, [ इन तीन ब्राह्मण वचनों से वह अपने को मन्त्र के अनुकूल करे ] ६ । ( अथ ह एतत् देवानां परिषूतं यत् ब्रह्मचारी ) और भी यह दिव्य लोकों का चलाने वाला है जो ब्रह्मचारी है । ( तत् अपि एतत् ऋचा उक्तम्--देवानामेतत्परिषूतमन्भ्यारूढं चरति रोचमानं, तस्मिन् सर्वे पशवस्तत्र यज्ञास्तस्मिन्नन्नं सह देवताभिः-इति ब्राह्मणम् ) वह भी इस ऋचा से कहा गया है--देवानामेतत्˙˙˙रोचमानं—अथ०--११ । ५ । २३ ॥ तस्मिन् सर्वे˙˙˙˙˙देवताभिः—ब्राह्मण वचन, दिव्य लोकों का सर्वथा चलाने वाला, कभी न हराया गया, प्रकाशमान यह [ व्यापक ब्रह्म ] विचरता है, उसमें सब पशु [ जीव ], उसमें यज्ञ, उसमें अन्न सब दिव्य पदार्थों के साथ हैं--यह ब्राह्मण है ॥ ७ ॥ भावार्थ:--ब्रह्मचारी दोष करने पर अनेक प्रकार प्रायश्चित करके परमात्मा में ध्यान लगाने से शुद्ध होवे ॥ ७ ॥ विशेष:—प्रतीक वाले वेद मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं । १-दिवो नु मां बृहतो अन्तरिक्षादपां स्तोको अभ्यपप्तद् रसेन । समिन्द्रि- येण पयसाहमग्ने छन्दोभिर्यज्ञैः सुकृतां कृतेन ॥ अथ० ६ । १२४ । १ ॥ ( दिवः ) प्रकाशमान सूर्य से, ( नु ) अथवा ( बृहतः ) [ सूर्य से ] बड़े ( अन्तरिक्षात् ) आकाश से ( अपाम् ) जल का ( स्तोकः ) बिन्दु ( माम् अभि ) मेरे ऊपर ( रसेन ) रस के साथ ( अपप्तत् ) गिरा है । ( सुकृताम् ) सुकर्मियों के ( कृतेन ) कर्म से, ( अग्ने ) हे सर्वव्यापी परमेश्वर ! ( इन्द्रियेण ) इन्द्रपन अर्थात् सम्पूर्ण ऐश्वर्य के साथ ( पयसा ) अन्न के साथ, ( छन्दोभिः ) आनन्ददायक कर्मों के साथ, ( यज्ञैः ) विद्यादि दानों के साथ ( अहम् ) मैं ( सम्=संगच्छेयम् ) मिला रहूँ ॥ २-देवानामेतत् परिषूतमन्भ्यारूढं चरति रोचमानम् । तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम् ॥ अथ० ११ । ५ । २३ ॥ ( देवानाम् ) प्रकाशमान लोकों का ( परिषूतम् ) सर्वथा चलाने वाला, ( अनभ्यारूढम् ) कभी न हराया गया, ( रोचमानम् ) प्रकाशमान ( एतत् ) यह [ व्यापक ब्रह्म ] ( चरति ) विचरता है, ( तस्मात् ) उस [ ब्रह्मचारी ] से ( ज्येष्ठम् ) सर्वोत्कृष्ट
शवदाहस्थानम् ( समयाय ) सम् + इण् गतौ-पचाद्यच् । आचाराय ( अघम् ) पापम् ( रिप्रम् ) लीरीङोर्ह्रस्वः पुट् च तरी० ( उ० ५ । ५५ ) रीङ् स्रवणे—रप्रत्ययः पुडागमो ह्रस्वश्च । रिप्रं पापनाम-निरु० ४ । २१ । पापम् । ( उपेयिम ) उप + इण् गतौ—लिट् । वयं प्राप्तवन्तः ( श्लोणः ) रस्य लः । श्लोणः । पङ्गुः ( परिषूतम् ) षू क्षेपे प्रेरणे—क्तः । परितः सूतम् । सर्वतः प्रेरकम् ॥