गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context९६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ९ ॥ के बीच में यज्ञ होता है, ब्रह्मा ही पुरस्तात्-होम और संस्थित-होमों के बीच में यज्ञ को धरता है। (भृग्वङ्गिरसः वेदान् हि ओडुह्य भृग्वङ्गिरसः सोमपानं मन्यन्ते, सोमा- त्मकः हि अयं वेदः) प्रकाशमान ज्ञान वाले वेदों को ही भले प्रकार प्राप्त करके प्रकाशमान ज्ञानवाले मनुष्य सोम पान को जानते हैं, सोमात्मक [अमृतमय] यह वेद है। (तत् अपि एतत् ऋचा उक्तम् । सोमं मन्यते पपिवान् इति) वह भी इस ऋचा से कहा गया है- सोमं मन्यते पपिवान् ...... अथ० १४ । १ । ३ । (तत् यथा इमाम् उदीर्णां ज्योतिषा धूमायमानां पृथिवीं वर्षा शमयति एवं ब्रह्मा भृग्वङ्गिरोभिः व्याहृतिभिः यज्ञस्य विरिष्टं शमयति) सो जैसे इस उदार, तेज से धुआं उठती हुई पृथिवी को वर्षा शान्त करती है, वैसे ही ब्रह्मा प्रकाशमान ज्ञान- वाले वेदों और व्याहृतियों से यज्ञ के उपद्रव को शान्त करता है। (अग्निः आदित्याय शमयति एते एते अङ्गिरसः इदं सर्वं समाप्नुवन्ति, वायुः आपः चन्द्रमाः इति एते एते भृगवः इदं सर्वं समाप्याययन्ति, एकम् एव संस्थं भवति इति ब्राह्मणम्) [प्रदत्त आहुति के रस को] अग्नि आदित्य को पहुँचाने हेतु [द्रव्य के] भस्म करता १ है। यह सब विद्वान् लोग इस सब कर्म को पूरा करते हैं। वायुः आपः चन्द्रमाः [यह ब्राह्मण वचन है इस से] यह सब भृगु [प्रकाशमान लोग] इस सब [जगत्] को यथावत् पुष्ट करते हैं, एक ही संस्था होता है- यह ब्राह्मण है ॥ ९ ॥ भावार्थ:- मनुष्यों को योग्य है कि वे ऋग्वेदी को होता, यजुर्वेदी को अध्वर्यु सामवेदी को उद्गाता और चारों वेद जानने वाले को ब्रह्मा वरण करके यज्ञ की सिद्धि करें ॥ ९ ॥ विशेष:-प्रतीक वाले मंत्र अर्थ सहित नीचे दिए जाते हैं। १- एकपाद् द्विपदो भूयो वि चक्रमे द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात् । द्विपाच्च षट्पदो भूयो वि चक्रमे त एक पदस्तन्वं समासते- अथ० १३ । २ । २७ । (एकपात्) एक रस व्यापक परमेश्वर (द्विपदः) दो प्रकार की स्थिति वाले [जङ्गम स्थावर जगत्] से (भूयः) अधिक आगे (वि) फैल कर (चक्रमे) चला गया, (द्विपात्) दो [भूत भविष्यन् ] में गति वाला परमात्मा (पश्चात्) फिर (त्रिपादम्) तीन [प्रकाशमान, अप्रकाशमान और मध्य लोकों] में व्याप्ति वाले संसार में (अभि) सब ओर से (एति) प्राप्त होता है, (द्विपात्) दो [जङ्गम और स्थावर जगत्] में व्यापक ईश्वर (ह) निश्चय करके (षट्पदः) छह [पूर्व दक्षिण पश्चिम उत्तर ऊंची और नीची दिशाओं] में स्थिति वाले ब्रह्माण्ड से (भूयः अधिक आगे (वि चक्रमे) निकल गया, (ते) वे [योगी जन] (एकपदः) एक रस व्यापक परमेश्वर की (तन्वम्) उपकार क्रिया को (सम् निरन्तर (आसते) सेवते हैं। ऊर्ध्वम् (संस्थाप्यते) समाप्यते (ओडुह्य) आ + उत् + वह प्रापणे--ल्यप् । समन्तात् प्राप्य (भृग्वङ्गिरसः) प्रकाशमानज्ञानयुक्ता विद्वांसः (वेदः) चतुर्वेदसमूहः (उदीर्णाम्) उत् + ऋ गतौ-क्तः । उदाराम् । महतीम् (वर्षम्) वृष्टिः (विरिष्टम्) दोषम् ॥ १. इस अर्थ की तुलना मनुस्मृति ३।७६ से करें- अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ॥ सम्पा० ॥