भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ९ ॥ ६७ २-अग्निवासाः पृथिव्यसितज्जूस्त्विषीमन्तं संशितं मा कृणोतु-अथ० १२ । १ । २१ (अग्निवासाः) अग्नि के साथ निवास करने वाली [ अथवा अग्नि के वस्त्र वाली ], (असितज्जूः) बन्धन रहित कर्म को जताने वाली (पृथिवी) पृथिवी (मा) मुझको (त्विषीमन्तम्) तेजस्वी और (संशितम्) तीक्ष्ण [ फुरतीला ] (कृणोतु) करे। ३-अन्तरिक्षे पथिभिरीयमानो न निविशते कतमच्चनाहः । अपां सखा प्रथमजा ऋतावा क्व स्विज्जातः कुत आ बभूव-ऋग्० १० । १६८ । ३ (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (पथिभिः) अनेक मार्गों से (ईयमानः) चलता हुआ [ वायु ] (कतमत् चन अहः) किसी दिन भी (न) नहीं (नि विशते) बैठता है। (अपाम्) जल का (सखा) सखा [ वायु ] (प्रथमजाः) पहले पदार्थों में उत्पन्न होने वाला (ऋतावा) सत्य नियम वाला वह (क्व स्वित्) कहां पर (जातः) उत्पन्न हुआ और (कुतः) कहां से (आ बभूव) प्राप्त हुआ है ॥ ४-उच्चा पतन्तमरुणं सुपर्णं मध्ये दिवस्तरणिं भ्राजमानम् । पश्याम त्वा सवितारं यमाहुरजस्रं ज्योतिर्यदविन्ददत्रिः-अथ० १३ । २ । ३६ (उच्चा) ऊंचे (पतन्तम्) ऐश्वर्यवान् होते हुये, (अरुणम्) सर्वव्यापक, (सुपर्णम्) बड़े पालने वाले, (दिवः) व्यवहार के (मध्ये) मध्य (तरणिम्) पार करने वाले, (भ्राजमानम्) प्रकाशमान, (सवितारम्) सर्वप्रेरक (त्वा) तुझ [परमेश्वर] को (पश्याम) हम देखें, (यम्) जिसको (अजस्रम्) निरन्तर (ज्योतिः) ज्योति (आहुः) वे [ विद्वान् लोग ] बताते हैं (यत्) जिस [ज्योति] को (अत्रिः) निरन्तर ज्ञानी [ योगी पुरुष ] ने (अविन्दत्) पाया है॥ ५-चन्द्रमा अप्स्व १ न्तरा सुपर्णो धावते दिवि । न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी-अथ० १८ । ४ । ८६, ऋग्० १ । १०५ । १, साम० पू० ५ । ३ । ६ । (सुपर्णः) सुन्दर पूर्ति करने वाला (चन्द्रमाः) चन्द्रलोक (अप्सु अन्तः) [ अपने ] जलों के भीतर (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (आ धावते) दौड़ता रहता है। (हिरण्यनेमयः) हे प्रकाशस्वरूप परमात्मा में सीमा रखने वाले (विद्युतः) विविध प्रकाशमान [ सब लोकों ! ] (वः) तुम्हारे (पदम्) ठहराव को (न विन्दन्ति) नहीं पाते हैं, (रोदसी) हे सूर्य के समान स्त्री पुरुषो! (मे) मेरे (अस्य) इस [वचन] का (वित्तम्) तुम दोनों ज्ञान करो ॥ ६-सोमं मन्यते पपिवान् यत् संपिषन्त्योषधिम् । सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति पार्थिवः-अथ० १४ । १ । ३, ऋग्० १० । ८५ । ३ । (सोमम्) चन्द्रमा [ के अमृत ] को (पपिवान्) मैने पी लिया [यह बात मनुष्य] (मन्यते) मानता है, (यत्) जब (ओषधिम्) ओषधि [ अन्न सोमलता आदि ] को (संपिंषन्ति) वे [ मनुष्य ] पीसते हैं। (यम्) जिस (सोमम्) जगत्- स्रष्टा परमात्मा को (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानी लोग (विदुः) जानते हैं, (तस्य) ७