भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 600 में से

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० १९ ॥ १२७ सदस्यत्त्वं, बलेः ह वै 'एतत् बलम् उपजायते यत् सदस्यः आमयतः वै व्रजस्य बहुलतरं व्रजं विदन्ति ) उसके दक्षिण ओर जो सब देवता बैठ गये, उससे वह सदस्य [ सभा में चतुर ] हुआ, वह सभा में चतुर पुरुष का सभा में चतुर्पन है। बलि [ भेंट ] से ही यह बल [ सामर्थ्य ] उत्पन्न होता है जो सभा में चतुर है चलते हुये मार्ग के देश की बहुत कर के बड़ाई करते हैं। (एषा दक्षिणा दिक् वै घोरा इतराः शान्ताः ) यह दक्षिण दिशा भयानक है और दूसरी शान्त हैं। [क्योंकि दक्षिण में यज्ञ का द्वार होता है ]। (तत् यानि स्तुतानि ब्रह्मा अनुमंत्रयते मनसा एव सदस्यः तानि जनत् इति एतां व्याहृतिं जपन् च इति आत्मानं जनयति, जित्या आत्मानम् अपित्वे न दधाति) सो जिन स्तोत्रों को ब्रह्मा मन्त्र के अनुकूल करता है, मन से ही सदस्य उन [स्तोत्रों] को और जनत् [गो० पू० १। ८] इस व्याहृति को जपता हुआ [ यज्ञ के ] आत्मा को प्रकट करता है और जीव से आत्मा को अप्राप्ति [ वस्तुओं को अभाव ] में नहीं रखता है [ अर्थात् सब पदार्थ पा लेता है ] । (तं देवाः अब्रुवन् वरं वृणीष्व इति ) उससे देवता बोले-वर मांग। (वृणै इति) [ इन्द्र बोला ] मैं मांगूं । ( स वरम् अवृणीत अस्याम् एव होत्रायां माम् इन्द्रभूतं पुनन्तः स्तुवन्तः शंसन्तः तिष्ठेयुः इति ) उसने वर मांगा - इस ही स्तुति में मुझ इन्द्र [ सूर्य समान ] होते हुये को पवित्र करते हुये, पूजते हुये और बड़ाई करते हुये आप लोग ठहरें। (तस्याम् एव होत्रायां तम् इन्द्रभूतं पुनन्तः स्तुवन्तः शंसन्तः अतिष्ठन् ) उस ही स्तुति में उस इन्द्र होते हुए को पवित्र करते हुए, पूजते हुए और बड़ाई करते हुए वे ठहरे । ( यत् तस्याम् एव होत्रायां तम् इन्द्रभूतं पुनन्तः स्तुवन्तः शंसन्तः अतिष्ठन् तत् ब्राह्मणाच्छंसी अभवत् ) जो उसी ही स्तुति में उस इन्द्र [ सूर्य ] होते हुए को पवित्र करते हुए, पूजते हुए, और बड़ाई करते हुए वे ठहरे, उससे वह ब्राह्मणाच्छंसी [ ब्रह्मज्ञान ( आमयतः) अम गतौ चुरादिः- शतृ । गच्छतः ( व्रजस्य ) मार्गस्य ( व्रजम् ) देशम् (विदन्ति) विद ज्ञाने-लट् । जानन्ति ( स्तुतानि ) स्तोत्राणि (जित्या) जयेन ( अपित्वे ) अ+पि गतौ - त्वन् । अभिपित्वम् = अभिप्राप्तिम् - निरु० ३ । १५ । अप्राप्तौ (होत्रायाम्) क० १६ । स्तुतौ । ( स्तुवन्तः) स्तौति=अर्चति- निघ० ३ । १४ । पूजयन्तः (शंसन्तः) प्रशंसन्तः (ब्राह्मणाच्छंसी) ब्राह्मणात्- १. यहाँ अर्थ की सङ्गति इस प्रकार है- दक्षिण दिशा की ओर समासीन ब्रह्मा के सामने सभी देवता सभा के रूप में बैठ गये इससे वह ब्रह्मा (सदसि साधुः ) सदस्य कहलाया । बलशाली ब्रह्मा का बल भी तभी उत्पन्न होता है जब सदस्य (देव) बैठते हैं। आगे- 'आमयतः वै व्रजस्य' यहाँ 'छादयति' का अध्याहार तथा विभक्ति विपरिणाम करके वाक्य होगा 'आमयतः वै व्रजम् छादयति' अर्थात् इस यज्ञ से व्रज = गोष्ठ रोगमुक्त हो जाता है, इस प्रकार पुष्कल पशुधन प्राप्त होते हैं। ऐसी अर्थसङ्गति 'बली' को इनि प्रत्ययान्त तथा 'व्रजः' में पचाद्यच् मानने से होगी ॥ सम्पा० ॥