भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 160

१२२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० २१ ॥ कण्डिका २१ ॥ वैश्वानर, जातवेदा और अश्व नामक अग्नि का वही विषय ॥ ( त्वा वैश्वानरम् अग्निम् आहुः सदनान् प्रदहन् उ अगाः, सः नः देवत्रा अधिब्रूहि, वयं तव मा रिषाम इति ) [ क० देखो २० ] तुझको वैश्वानर [ सब नरों का हितकारी ] अग्नि लोग कहते हैं, [ शत्रुओं के ] घर वालों को जलाता हुआ तू चला है, सो तू हमसे विद्वानों के बीच अधिकार पूर्वक बोल, हम तेरे होकर दुखी न होवें [ यह ब्राह्मण वचन है ] । ( तम् एताभिः पंचभिः ऋग्भिः उपाकुरुते, यत् प्रथमं जायमानः अक्रन्दः इति ) उस [ अश्व ] को इन पांच ऋचाओं से वह [ ब्राह्मण ] संस्कार करता है—जो तूने उत्पन्न होते हुये पहिले शब्द किया है, [ यह प्रतीक ऋग्वेद १ । १६३ । १–५ की, है, देखो क० १८ ] । ( सः अशाम्यत् ) वह [ अश्व अग्नि ] शान्त हो गया, ( तस्मात् अश्वः पशूनां जिघत्सुतमः भवति ) इसलिये अश्व पशुओं में अधिक खानेवाला होता है [ वैसा ही अग्नि है ] । ( एषः हि वैश्वानरः ) यही [ अश्व ] वैश्वानर [ अग्नि ] है, ( तस्मात् अग्निपदम् अश्वं ब्रह्मणे ददाति ) इसलिये अग्नि पद वाले अश्व को ब्रह्मा [ विद्वान् ] के लिये देता है । ( ब्रह्मणे हि प्रत्तं तस्य रसम् अपीडयत् ) ब्रह्मा के लिये उस दिये हुये के रस को उस [ प्रजापति ] ने निचोड़ा । ( सः रसः अभवत् ) वह रस हो गया । ( रसः ह वै एषः, तं वै एतं रसं सन्तं रथः इति आचक्षते ) रस ही यह है उस रस होते हुये को ही—यह रथ है—ऐसा लोग कहते हैं । ( परोक्षेण ) परोक्ष [ आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म ] के द्वारा ( परोक्षप्रियाः इव हि ) परोक्षप्रिय [ आंख ओट भविष्य के प्रेमी ] लोगों के समान ही ( देवाः ) देवता [ विद्वान् लोग ] ( प्रत्यक्षद्विषः ) प्रत्यक्ष [ वर्त्तमान अवस्था ] के द्वेषी [ विरोधी ] ( भवन्ति ) होते हैं [ देखो गो० पू० १ । १ ] । ( सः देवान् आगच्छत् ) वह [ रथ वा रस ] देवों [ इन्द्रियों ] में आया । ( सः देवेभ्यः अन्वातिष्ठत् ) और वह देवों के लिये अनुष्ठान करने लगा । ( तस्मात् देवाः अबिभयुः, तं ब्रह्मणे प्रायच्छन् ) उससे देव डर गये, उसे उन्होंने ब्रह्मा को दे दिया ( तम् एतया ऋचा आज्याहुत्या अभ्यजुहोत् ) उसको इस ऋचा द्वारा घृत की आहुति से उसने ग्रहण किय:—( इन्द्रस्योजो मरुतामनीकम् इति ) इन्द्रस्यौजो मरुतामनीकम्—अथ० ६ । १२५ । ३ ॥ २१—( आहुः ) कथयन्ति ( सदनान् ) सदन—अर्शआद्यच् । शत्रुगृहवतः पुरुषान् ( उ ) वितर्के ( अगाः ) प्राप्तवान् ( नः ) अस्मान् ( मा रिषाम ) हिंसिता मा भूम ( जिघत्सुतमः ) अद भक्षणे—सन्, घस्लृ आदेशः । सनाशंसभिक्ष उः ( पा० ३ । २ । १६८ ) जिघत्स—उः, तमप् । अतिशयेन भक्षणेच्छुः । महाशनः— निरु० २ । २७ । (पदम्) प्रापणीयम् (प्रत्तम् ) अच उपसर्गात्तः ( पा० ७ । ४ । ४७ )

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य) · पृष्ठ 160, कुल 600 में से · BharatKosha