भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 600 में से

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पृष्ठ 175

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० ३ १३७ यज्ञस्य अर्द्धम् अन्तर् अगात् इति ) अरुण का पुत्र श्वेतकेतु तब ही ब्रह्मा को बोलते हुये देख कर कहने लगा—मेरे इस यज्ञ का आधा भाग छिप गया। (तस्मात् ब्रह्मा बहिष्पवमाने वाचोयम्यम् उपांशु यामाभ्याम् अन्तर् स्तुते) इसलिये ब्रह्मा दो बहिष्पवमान स्तोत्र को वाणी रोक कर चुपचाप दो पहर तक बोलता है। (अथ ये पवमाने उदूचुः तेषु अथ यानि च स्तोत्राणि च शस्त्राणि आवषट्कारात् तेषु सः यत् ऋक्तःभ्रेषं नियच्छेत् ओं भूः जनत् इति गार्हपत्ये जुहुयात् ) और जो पुरुष दो पवमान स्तोत्रों को बोलें उनमें, और जो स्तोत्र और शस्त्र वषट्कार के साथ यज्ञ समाप्ति तक होते हैं उनमें, वह [ब्रह्मा] जो ऋग्वेद से गिराव [त्रुटि] को रोके, ओम् भूः जनत्—इन [व्याहृतियों] से गार्हपत्य अग्नि में हवन करे। (यदि यजुष्टः ओं भुवः जनत् इति दक्षिणाग्नौ जुहुयात् ) जो यजुर्वेद से [त्रुटि को रोके]—ओम् भुवः जनत्— इनसे दक्षिणाग्नि में हवन करे।( यदि सामतः, ओं स्वः जनत् इति आहवनीये जुहुयात् ) जो सामवेद से [त्रुटि को रोके ]—ओं स्वः जनत्—इनसे आहवनीय अग्नि में हवन करे। (यदि अनाज्ञाताः ब्रह्मणो१, ओं भूः भुवः स्वः जनत् ओम् इति आहवनीये एव जुहुयात् ) जो न जानी हुई ब्रह्मा की क्रियाओं को [रोके ]—ओम् भूः भुवः स्वः जनत्—इन [व्याहृतियों] से आहवनीय अग्नि में ही हवन करे। (तत् वाकोवाक्यस्य ऋचां, यजुषां, साम्नाम्, अथर्वाङ्गिरसां अथ अपि वेदानां रसेन यज्ञस्य विरिष्टम् सन्धीयते ) वह वाकोवाक्य के ऋग्वेद मन्त्रों के, यजुर्वेद मन्त्रों के, सामवेद मन्त्रों के और चारों वेद मन्त्रों के और वेदों के रस—[ध्वनि] से यज्ञ का दोष सुधर जाता है। (तत् यथा लवणेन इति उक्तम् ) सो जैसे लवण [खार] के साथ यह कहा गया है [गोपथ पू० १।१४], (तत् यथा उभयपात् पुरुषः यन् उभयचक्रः रथः वा वर्तमानः अभ्रेषं न्येति एवम् एव अस्य यज्ञः अभ्रेषं न्येति ) सो जैसे दो पांव वाला पुरुष चलता हुआ, अथवा दो पहिये वाला रथ वर्त्तमान [जाता हुआ] नहीं चलता [स्थिरता] पाता है, वैसे ही इस [यजमान] का यज्ञ निश्चलता पाता है। (यज्ञस्य अभ्रेषम् अनु यजमानः अभ्रेषं न्येति ) यज्ञ की निश्चलता के साथ यजमान निश्चलता [अकर्मण्यता] पाता है। (यजमानस्य अभ्रेषम् अनु ऋत्विजः अभ्रेषं नियन्ति ) यजमान की निश्चलता के साथ ऋत्विज् लोग निश्चलता पाते हैं। (ऋत्विजाम् अभ्रेषम् अनु दक्षिणाः अभ्रेषं नियन्ति ) ऋत्विजों की निश्चलता के साथ दक्षिणार्यें निश्चलता पाती हैं। (दक्षिणानाम् अभ्रेषम् अनु यजमानः पुत्रपशुभिः अभ्रेषं न्येति ) दक्षिणाओं की निश्चलता के साथ यजमान पुत्रों और पशुओं सहित निश्चलता पाता है। (पुत्रपशूनाम् अभ्रेषम् अनु यजमानः स्वर्गेण लोकेन अभ्रेषं न्येति ) पुत्रों ओर पशुओं की निश्चलता ३—(आरुणेयः) अरुण—ढक् । अरुणस्य पुत्रः ( अन्तर्) अदर्शनम् । मध्ये (स्तुते) स्तौति (बहिः पवमाने) स्तोत्रविशेषद्वयम् (वाचोयम्यम् ) यम उपरमे —यत् । वाचः वाण्याः यम्यं यमन विरोधं कृत्वा (उपांशु) अप्रकाशे गुप्ते (यामाभ्याम् ) प्रहराभ्याम् (उदूचुः) उच्चारितवन्तः (आवषट्कारात् ) वषट्- १. पू० सं० 'ब्रह्मतो' इति पाठः स चासङ्गतः ॥ सम्पा० ॥