भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 600 में से

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पृष्ठ 177

भांति ब्रह्म को बताने वाली ऋचा ] बोला, इसलिये उद्गाता को दक्षिणायें दी जाती हैं ( ग्रहान् मे अग्रहीत् प्राचारीत् मे, अश्रुश्रुवत् मे, संमनसः कार्षीत्, अयाक्षीत् मे, अवषट्कार्षीत् मे इति अध्वर्य्यवे ) [ जिसलिये अध्वर्य्यु ने ] ग्रहों [ सोमपात्रों ] को मेरे लिये ग्रहण किया, मेरे लिये प्रचार किया, मेरे लिये [ वेदमन्त्र ] सुनवाये, [ लोगों को ] समान मन वाला किया, मेरे लिये यज्ञ किया, मेरे लिये वषट् [ समाप्ति का शब्द ] किया, इसलिये अध्वर्य्यु को [ दक्षिणायें लायी जाती हैं ] । ( होतुःसदने आसिष्ट, अयाक्षीत् मे, अशांसीत् मे, अवषट्कार्षीत् मे, इति होत्रे ) [ जिसलिये होता ] होतृसदन में बैठा, मेरे लिये यज्ञ किया, मेरे लिये स्तुति की, मेरे लिये वषट्कार किया, इसलिये होता को [ दक्षिणायें लायी जाती हैं ] । ( ब्रह्मा देवयजनं मे अचीक्लपत्, सादं मे असीसृपत् ब्रह्मजपान् मे अजपीत्, पुरस्ताद्धोमसंस्यितहोमान् मे अहौषीत्, अयाक्षीत् मे, अशांसीत् मे, अवषट्कार्षीत् मे, इति ब्रह्मणे ) [ जिसलिये ] ब्रह्मा ने देवयजन मेरे लिये ठीक बनाया, मेरे लिए स्थान पहुँचाया, मेरे लिए वेद के जप जपे, मेरे लिए पुरस्तात्- होम और संस्थितहोमां को हवन किया, मेरे लिए यज्ञ किया, मेरे लिए स्तुति की, मेरे लिए वषट् [ यज्ञ समाप्ति का शब्द ] किया, इसलिए ब्रह्मा को [ दक्षिणायें दी जाती हैं ] । ( भूयिष्ठेन ब्रह्मणा मा अकार्षीत् इति एतत् वै भूयिष्ठं ब्रह्म यत् भृग्वङ्गिरसः ) [ ब्रह्मा ने ] बहुत अधिक ब्रह्मज्ञान के साथ मुझे किया है, यही बहुत अधिक ब्रह्मज्ञान है, जो भृगु अङ्गिरा [ परिपक्व ज्ञान वाले चारों वेद ] हैं । ( ये अङ्गिरसः सः रसः ये अथर्वाणः ) जो अङ्गिरस [ ज्ञान वाले चारों वेद ] हैं, जो अथर्वा [ निश्चल ज्ञान वाले चारों वेद ] हैं, वह रस है । ( ये अथर्वाणः तद् भेषजम् ) जो अथर्वा [ निश्चल ज्ञान वाले चारों वेद ] हैं, वह औषध है । ( यत् भेषजं तत् अमृतं यत् अमृतं तत् ब्रह्म, सः वै एषः ) जो ओषध है वही अमृत है, जो अमृत है वह ब्रह्म [ वेद ज्ञान ] है, वही [ ज्ञान स्वरूप ] यह [ ब्रह्मा ] है । ( पूर्वेषाम् ऋत्विजाम् अर्द्धभागस्य अर्द्धम् इतरेषाम् ब्रह्मणः अर्द्धम् इति ब्राह्मणम् ) पहिले ऋत्विजों की सम्पत्ति के भाग का आधा दूसरों [ उद्गाता, अध्वर्य्यु और होता ] का है और आधा ब्रह्मा का है, यह ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है १ ॥ ४ ॥ सात्तुः ( पा० ४ । ४ । ६८ ) सुब्रह्मन्-यत्, टाप् । सुब्रह्मणि सुष्ठु वेदज्ञाने प्रवृ- त्ताम् स्तुतिम् ऋचं वा ( अह्वासीत् ) आ + ह्वेञ् शब्दे-लुङ् । आहूतवान् ( नीयन्ते ) प्राप्यन्ते । दीयन्ते ( ग्रहान् ) सोमपात्राणि ( अश्रुश्रुवत् ) श्रु श्रवणे- णिच्, लुङ् । श्रावितवान् ( संमनसः ) समानहृदयान् ( अशांसीत् ) शंसु स्तुतौ- लुङ् । स्तुतवान् (अवषट्कार्षीत् ) वषट्कार, नामधातुः--लुङ् । वषट् शब्दम् अकार्षीत् ( अचीक्लपत् ) समर्थं योग्यं कृतवान् ( सादम् ) स्थानम् ( असीसृपत् ) सृप्लृ गतौ-णिच्-लुङ् । अगमयत् । प्रापितवान् ( भूयिष्ठेन ) बहुतमेन ( ब्रह्मणा ) वेदज्ञानेन ( भेषजम् ) औषधम् ( अर्द्धम् ) ऋधु वृद्धौ-घञ् । द्वयो- र्मध्ये समभागः । समृद्धिः ॥ १. कण्डिका का भ्रष्टपाठ एवं तदनुसार अर्थ ठीक किया है ।। सम्पा० ॥