भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 600 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 198

१६० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १३ ॥ मैं सब प्रकार होम करूं [ यह कहे, इस में ] तेरी क्या विद्या है और क्या प्रायश्चित्त है २ । (गार्हपत्याद् अधि आहवनीयं प्रणीय प्रतीचः अङ्गारान् उद्धृत्य समानव्यानाभ्यां स्वाहा इति जुहुयात् ) [ उद्दालक बोला ] गार्हपत्य अग्नि से आहवनीय अग्नि को लेकर पश्चिम ओर वाले अङ्गारों को निकाल कर--(समानव्यानाभ्यां स्वाहा ) नाभि वाले और सब शरीर में फैलने वाले श्वास के लिये सुन्दर आहुति है—इस मन्त्र से होम करे ( अथ प्रातः यथास्थानम् अग्नीन् उपसमाधाय यथापुरं जुहुयात् सा मे विद्या सा प्रायश्चित्तिः इति २ ) फिर प्रातःकाल अपने अपने स्थान पर अग्नियों को ठीक कर के पहिले के समान होम करे, यह मेरी विद्या और यह प्रायश्चित्त है २ । ( अथ चेत् गार्हपत्यः उद्वायात् किं वा ततः भयम् आगच्छेत् इति, क्षिप्रं गृहपतिः प्रैति, यः विद्वान् जुहोति विद्यया तु एव अहम् अभि जुहोमि इति, का ते विद्या का प्राय- श्चित्तिः इति ३ ) [ प्राचीनयोग्य बोला ] फिर जो गार्हपत्य अग्नि भड़क उठे अथवा उस से कुछ भय आवे, [ जिससे ] गृहपति शीघ्र चला जावे, और जो विद्वान् होम करता है (विद्यया......) विद्या के साथ फिर भी मैं सब प्रकार होम करूं [ यह कहे, उस में ] तेरी क्या विद्या है और क्या प्रायश्चित्त है ३ । ( दक्षिणेन दक्षिणाग्निं परिहृत्य सभ- स्मकम् आहवनीयं गार्हपत्यस्य आयतने प्रतिष्ठाप्य ततः आहवनीयं प्रणीय उदीचः अङ्गारान् उद्धृत्य उदानरूपाभ्यां स्वाहा इति जुहुयात्, अथ प्रातः यथास्थानम् अग्नीन् उपसमाधाय यथापुरं जुहुयात् सा मे विद्या सा प्रायश्चित्तिः इति ३ ) [ उद्दालक बोला ] दाहिने हांथ से दक्षिणाग्नि को छोड़ कर, भस्म सहित आहवनीय अग्नि को गार्हपत्य के स्थान में रख कर फिर आहवनीय अग्नि को लेकर उत्तर ओर वाले अङ्गारों को निकाल कर--(उदानरूपाभ्यां स्वाहा ) कण्ठ से ऊपर वाले वायु और रूप के लिए सुन्दर आहुति है—इस मन्त्र से हवन करे, फिर प्रातःकाल अपने-अपने स्थान में अग्नियों को ठीक करके पहिले के समान होम करे, यह मेरी विद्या और यह प्रायश्चित्त है ३। ( अथ चेत् सर्वे अग्नयः उद्वायेयुः किं वा ततः भयम् आगच्छेत् इति, क्षिप्रं गृहपतिः सर्वज्यानिं जीयते, यः विद्वान् जुहोति विद्यया तु एव अहम् अभि जुहोमि इति, का ते विद्या का प्रायश्चित्तिः इति ४ ) [ प्राचीन-योग्य बोला ] फिर जो सब अग्नियां भड़क उठें, अथवा उससे कुछ भय आवे [ जिससे ] गृहपति शीघ्र सब हानि प्राप्त करे, और जो विद्वान् होम करता है—[विद्यया......] विद्या के साथ फिर भी मैं सब प्रकार होम करूँ [यह कहे, इसमें] तेरी क्या विद्या है और क्या प्रायश्चित है ४ । ( आनडुहेन शकृत्पिण्डेन अग्न्यायतनानि परिलिप्य होम्यम् उपसाद्य अग्निं निर्मन्थ्य प्राणापानाभ्यां स्वाहा, यथापूर्वम् (प्रतीचः) पश्चिमदिशि स्थितान् (परिहृत्य) परित्यज्य (आयतने) यज्ञस्थाने (उद्धृत्य) उत्+हृञ् हरणे-ल्यप् । बहिष्कृत्य (सर्वज्यानिम्) वीज्याज्यरिभ्यो निः (उ० ४।४८) ज्या वयोहानौ-निः । सर्वक्षतिः । (जीयते) कर्मणि प्रयोग आर्षः । जयति प्राप्नोति (आनडुहेन) अनुडुहो--अण् । धेनुसंबन्धिनी (शकृत्पिण्डेन) विष्ठासंचयेन (होम्यम्) होम--यत् । होमाय हितं हविः । (मोघम्) निष्फलम् (इष्टम्) अभीष्टम् (आत्मनि) मनसि ॥

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य) · पृष्ठ 198, कुल 600 में से · BharatKosha