भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० २३ ॥ १७६ कण्डिका २३ ॥ पुत्रेष्टि यज्ञ का विधान ॥ ( अथ यस्य दीक्षितस्य ऋतुमती प्रतिस्नावा जाया स्यात् प्रतिस्नावा सरूपवत्सायाः गोः पयसि स्थालीपाकं श्रपयित्वा अभिघार्य्य उद्वास्य उद्धृत्य अभि- हिंकृत्य गर्भवेदनपुंसवनैः सम्पातवन्तं कृत्वा तं परा एव प्राश्नीयात् ) फिर जिस दीक्षित पुरुष की ऋतुमती [ मासिक धर्म वाली होकर ] स्नान किये हुये पत्नी होवे, तो उसी समान शुद्ध हुवे दूध वाली सवत्सा [बछड़े वाली] गौ के दूध में स्थालीपाक [ कड़ाही में पके हुये अन्न विशेष ] को पकवाकर, घी से सींचकर, [कस्तूरी आदि से] सुगन्धित करके, बाहर निकाल कर, मन्त्र विशेष पढ़कर, गर्भज्ञान के सूचक पुंसवन आदि संस्कारों से सब ऐश्वर्य प्राप्त कराने वाले मन्त्रों से युक्त करके उस [ स्थालीपाक ] को दूसरी [ अर्थात् पत्नी ] के साथ ही भोजन करे। ( रेतः वै अन्नम्, वृषा हिङ्कारः ) वीर्य ही अन्न है और ऐश्वर्य्यवान् हिंकार [ मन्त्र विशेष ] है। ( एवं हि ईश्वराय दीक्षिताय दीक्षिता जाया पुत्रं लभेत इति एतेन एव प्रक्रमेण यजेत इति ब्राह्मणम् ) इस प्रकार से ही समर्थ दीक्षा पाये हुए पुरुष के लिये दीक्षा पायी हुई पत्नी पुत्र प्राप्त करे, इसी ही प्रक्रम [ क्रम ] से यज्ञ करे— यह ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है ॥ २३ ॥ भावार्थः—दीक्षित पुरुष दीक्षिता पत्नी के साथ यथाविधि स्थालीपाक भोजन करके संतान उत्पन्न करे ॥ २३ ॥ विशेषः स्थालीपाक मिश्री के मोहनभोग में कस्तूरी, केशर, जायफल, जावित्री, यथाविधि मिला कर बनाया जाता है—देखो श्रीमद्दयानन्द कृत संस्कारविधि सामान्य प्रकरण ॥ इति श्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिम श्रीसयाजीराव गायकवाडा- धिष्ठित बड़ोदे पुरीगत श्रावणमासदक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामार्थववेदभाष्येषु २३--( ऋतुमती ) रजस्वला । स्त्रीधर्मवती ( प्रतिस्नावा ) आतो मनिन् क्वनिब् वनिपश्च ( पा० ३ । २ । ७४ ) प्रति+ष्णा शौचे-वनिप् । सम्यक्कृतस्नाना । ( स्थालीपाकम् ) स्थाल्यां पाको यस्य तम् । गोदुग्धेन स्थाल्यां कृतं पाकभेदम् ( श्रपयित्वा ) श्रा पाके—णिच् -- क्त्वा । पाचयित्वा ( अभिघार्य्य ) अभि + घृ क्षरणे—णिच्—ल्यप् । आभिमुख्येन घृतादिना संसिच्यं ( उद्वास्य ) कस्तूर्यादिना सुरभीकृत्य ( उद्धृत्य ) उद् +हृ--ल्यप् । निःसार्य्य ( अभिहिङ्कृत्य ) मन्त्र- विशेषैः अभिमन्त्र्य ( गर्भवेदनपुंसवनैः) गर्भसूचकपुंसवनादिसंस्कारैः (संपात- वन्तम्) सम्+पत्तृ गतौ ऐश्वर्ये च--घञ्--मतुप् । सर्वैश्वर्य्यप्राप्तिमन्त्र- विशिष्टम् । ( तम्) स्थालीपाकम् ( परा ) परया । जायया सह ( वृषा ) कनिन् युवृषितक्षि० ( उ० १ । १ । १५६ ) वृषुसेचने, प्रजननैश्वर्ययोश्च-कनिन् । वर्षकः । प्रजनयिता । ऐश्वर्यवान् । ( हिङ्कारः ) हिम् इति अव्यक्तं शब्दं करोति । कृ-- अण् । हिंशब्दकारकः ( दीक्षिता ) दीक्षा--इतच् , टाप् । प्राप्तदीक्षा ( प्रक्रमेण ) उपायज्ञानपूर्वककारम्भेण ॥