गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ओ३म् ॥ गोपथ ब्राह्मण भाष्य भूमिका ॥ १—ईश्वर प्रार्थना ॥ त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनाषहम् ॥ १ ॥ मन्त्र १-३ अथर्व० २० । १०८ । १-३, ऋग्० ८ । ६८ [ सायणाभाष्य ८७ ] । १०-१२, साम० उ० ४ । २ । तृच १३ ॥ ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्म करने वाले ! ( विचर्षणे ) हे विविध प्रकार देखने वाले ! ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले जगदीश्वर ] ( त्वम् ) तू ( नः ) हमारे लिये ( ओजः ) पराक्रम, ( नृम्णम् ) धन ( आ ) और ( पृतनासहम् ) सङ्ग्राम जीतने वाले ( वीरम् ) वीर को ( आ ) भले प्रकार ( भर ) पुष्ट कर ॥ १ ॥ हे परमात्मन् ! आपके अनुग्रह से हम सैकड़ों शुभ कर्म करते हुये बलवान्, धनवान् और वीर पुरुषों वाले होवें ॥ १ ॥ त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमीमहे ॥ २ ॥ ( वसो ) हे बसाने वाले ! ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्मों वाले ! [ परमेश्वर ] ( त्वम् ) तू ( हि ) ही ( नः ) हमारा ( पिता ) पिता और ( त्वम् ) तू ही ( माता ) माता ( बभूविथ ) हुआ है, ( अध ) इसलिये ( ते ) तेरे ( सुम्नम् ) सुख को ( ईमहे ) हम माँगते हैं ॥ २ ॥ हे परमेश्वर ! आप सदा से सब सृष्टि के पालन और पोषण करने वाले हैं, हम आप से प्रार्थना करते हुये सैकड़ों उपकार करके सदा सुखी होवें ॥ २ ॥ त्वां शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो । स नो रास्व सुवीर्य्यम् ॥ ३ ॥ ( शुष्मिन् ) हे महाबली ! ( पुरुहूत ) हे बहुत प्रकार से बुलाये गये ! ( शतक्रतो ) हे सैकड़ों कर्मों वाले ! [ परमेश्वर ] ( वाजयन्तम् ) बलवान् बनाने वाले ( त्वाम् ) तुझको ( उप ) आदर से ( ब्रुवे ) मैं बुलाता हूं, ( सः ) सो तू ( नः ) हमें ( सुवीर्य्यम् ) बड़ा वीरपन ( रास्व ) दे ॥ ३ ॥ हे अनन्त बल जगदीश्वर ! आप कृपा करें । जिससे हम महापराक्रमी और महापुरुषार्थी होकर सदा आनन्द पावें ॥ ३॥