भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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१६४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० १० ॥ देवता होता है, अग्नि देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे पूजते हैं। ५। (अथ यत् स्वरसाम्नः उपयन्ति, तत् अपः एव देवीः देवताः यजन्ते, आपः देव्यः देवताः भवन्ति अपां देवीनां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब स्वर- साम यज्ञों को स्वीकार करते हैं, तब जल ही देव देवता को पूजते हैं, जल देव देवता होता है, जल देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं। ६। ( अथ यत् विषुवन्तम् उपयन्ति तत् सूर्य्यम् एव देवं देवतां यजन्ते, सूर्यः देवः देवता भवति सूर्य्यस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब विषु- वत् [ ग्रीष्म और शीत में तुल्य दिन रात वाले यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं तब सूर्य ही देव देवता को पूजते हैं, सूर्य देव देवता होता है, सूर्यदेव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं, जो इसे स्वीकार करते हैं। ७। ( आवृत्ताः स्वरसामानः उक्ताः ) बार बार आने वाले स्वरसाम कहे गये । ( अथ यत् विश्वजितम् उपयन्ति तत् इन्द्रम् एव देवं देवतां यजन्ते, इन्द्रः देवः देवता भवति, इन्द्रस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब विश्वजित् यज्ञ को स्वीकार करते हैं तब इन्द्र [ ऐश्वर्य वान् ] ही देव देवता को पूजते हैं, इन्द्र देव देवता होता है, इन्द्र देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं। ८। ( पृष्ठचाभिपप्लवौ उक्तौ ) पृष्ठ्य ओर अभिपप्लव यज्ञ दोनों कहे गये । ( अथ यत् गवामयुषीं उपयन्ति तत् मित्रावरुणौ एव देवौ देवते यजतः मित्रावरुणौ देवौ देवते भवतः मित्रावरुणयोः देवयोः सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब गवामयुषी [ गो विद्या वा पृथिवी ओर आयु अर्थात् जीवन वाले दो यज्ञों ] को स्वीकार करते हैं, तब मित्र और वरुण [ प्राण और अपान ] दोनों देव देवता पूजे जाते हैं, मित्र और वरुण दोनों देव देवता होते हैं, मित्र और वरुण देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं । ६ । ( अथ यत् दशरात्रम् उपयन्ति, तत् विश्वान् एव देवान् देवतां यजन्ते, विश्वेदेवाः देवताः भवन्ति विश्वेषां देवानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब दशरात्रि यज्ञ को स्वीकार करते हैं, तब सब ही देवों देवता को पूजते हैं सब ही देव देवता होते हैं, सब ही देवों का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं। १०। (अथ यत् दाशरात्रिकं पृष्ठ्यं षडहम् उपयन्ति तत् दिशः एव देवीः देवताः यजन्ते दिशः देव्यः देवताः भवन्ति, दिशां देवीनां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब दाशरात्रिक पृष्ठ्य पडहं [ छह दिन वाले यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं तब दिशा ही देवियों देवता को पूजते हैं दिशा देवियां देवता होती हैं, दिशा देवियों का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं। ११। (अथ यत् छन्दोमतत्त्र्यहम् उपयन्ति तत् इमान् एव लोकान् देवान् देवतां यजन्ते इमे लोकाः देवाः देवताः भवन्ति एषां लोकानां देवानां सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब छन्दोमत् त्र्यह [ छन्दयुक्त तीन दिन वाले यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं, तब इन ही लोकों देवों देवता को पूजते हैं, यह लोक देव देवता होते हैं इन दिव्य लोकों का सहयोग और सहवास वे पाते हैं, जो इसे स्वीकार करते हैं। १२। ( अथ यत् दशमम् अहः उपयन्ति तत् संवत्सरम्