गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ११ ॥ १६५ एव देवं देवतां यजन्ते, संवत्सरः देवः देवता भवति, संवत्सरस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब दशम अहः [ दसवें दिन वाले यज्ञ ] को स्वीकार करते हैं, तब संवत्सर ही देव देवता को पूजते हैं, संवत्सर देव देवता होता है, संवत्सर देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं । १३ । ( अथ यत् महाव्रतम् उपयन्ति तत् प्रजापतिम् एव देवं देवतां यजन्ते. प्रजापतिः देवः देवता भवति, प्रजापतेः देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब महाव्रत यज्ञ को स्वीकार करते हैं तब प्रजापति ही देव देवता को पूजते हैं, प्रजापति देव देवता होता है, प्रजापति देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं । १४ । ( अथ यत् उदयनीयम् अतिरात्रम् उपयन्ति तत् स्वर्गम् एव लोकम् देवं देवतां यजन्ते. स्वर्गः लोकः देवः देवता भवति, स्वर्गस्य लोकस्य देवस्य सायुज्यं सलोकतां यन्ति ये एतत् उपयन्ति ) फिर जब उदयनीय अतिरात्र यज्ञ को स्वीकार करते हैं तब स्वर्ग ही लोक देव देवता को पूजते हैं, स्वर्ग लोक देव देवता होता है स्वर्ग लोक देव का सहयोग और सहवास वे पाते हैं जो इसे स्वीकार करते हैं । १५ । ( तत् वै एतत् संवत्सरस्य जन्म ) सो यही संवत्सर का जन्म है । ( यः एवं संवत्सरस्य जन्म वेद सः एतत् संवत्सरम् आप्त्वा स्वर्गे लोके प्रतिष्ठति ) जो इस प्रकार संवत्सर के इस जन्म को जानता है, वह इस संवत्सर को पाकर स्वर्ग- लोक में ठहरता है । ( प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति, यः एवं वेद, संवत्सरेण सात्मा सलोकः भूत्वा देवान् अप्येति इति ब्राह्मणम् ) वह प्रजा [ संतानादि ] से और पशुओं से प्रतिष्ठा पाता है जो ऐसा जानता है, और संवत्सर के साथ एक आत्मा वाला और एक लोक वाला होकर दिव्य गुणों को पाता है—यह ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है ॥ १० । भावार्थः—यहां संवत्सर यज्ञ का विशेष वर्णन है, भावार्थ कण्डिका ९ के समान है ॥ १०॥ विशेषः—इस कण्डिका का मिलान क० ७ । ८ । ९ से करो ॥ कण्डिका ११ ॥ स वा एष संवत्सरोऽधिदेवं चाध्यात्मं च प्रतिष्ठितः स य एवमेतत् संवत्सरमधिदैवं चाध्यात्मं च प्रतिष्ठितं वेद प्रतिष्ठति प्रतितिष्ठति प्रजया पशु- भिर्य एवं वेद स वा एष संवत्सरः ॥ ११ ॥ 'कण्डिका ११ ॥ संवत्सर के ज्ञान की महिमा ॥ ( सः वै एषः संवत्सरः अधिदैवं च अध्यात्मं च प्रतिष्ठितः ) सो यही संवत्सर अधिदैव [ मुख्य देवता ] और अध्यात्म [ आत्मा के अधिकार वाला ज्ञान ] होकर ठहरा है । ( यः एवम् एतत् संवत्सरम् अधिदैवं च अध्यात्मं च प्रतिष्ठितं वेद. सः प्रतिष्ठति ) जो पुरुष इस प्रकार इस संवत्सर को अधिदेव और अध्यात्म ठहरा हुआ