गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० २४ ॥ २०६ से अभिजित्, (अभिजितः स्वरसामानः) अभिजित् से स्वरसाम, (स्वरसामभ्यः विषुवान्) स्वरसामों से विषुवान् (विषुवतः स्वरसामानः) विषुवान् से स्वरसाम, (स्वरसामभ्यः विश्वजित्) स्वरसामों से विश्वजित्, (विश्वजितः पृष्ठचाभिपॢवौ) विश्वजित् से पृष्ठ्य और अभिपॢव, (पृष्ठचाभिपॢवाभ्यां गतायुषी) दोनों पृष्ठ्य और अभिपॢवों से दोनों गवायु, (गवायुभ्यां दशरात्रः) दोनों गवायु से दशरात्र [यज्ञ बनाया गया है]। (तानि ह वै एतानि यज्ञारण्यानि यज्ञकृत्तन्त्राणि) वे ही यज्ञ- रूप वन और यज्ञ करने वाले के तन्त्र [उपाय] हैं। (तेषां शतं शतं रथानां न्यन्तरम्) उन [यज्ञों] के बीच सौ सौ रथों [पगों वा मान विशेषों] का निश्चित अन्तर हो। (तत् यथा अरण्यानि आरूढाः पाप्मानं दृहती ते अशना- पिपासे परिप्लवेते एवं ह एव एते प्रप्लवन्ते ये विद्वांसः उपयन्ति, अथ ये विद्वां- सम् उपयन्ति) सो जैसे वन में चढ़े हुये पुरुष कष्ट को बढ़ाती हुई उन दोनों भूख प्यास को लांघ जाते हैं, ऐसे ही यह [यजमान लोग यज्ञ को] पार करते हैं जो विद्वान् लोग [यज्ञ को] स्वीकार करते हैं और जो लोग विद्वान् को स्वीकार करते हैं। (तत् यथा प्रवाहात् प्रवाहं स्थलात् स्थलं समात् समं सुखात् सुखम् अभयात् अभयम् उपमङ्क्रामन्ति इति एवं ह एव एते संवत्सरंस्य उदचं समश्नवामहै इति ब्राह्मणम्) सो जैसे प्रवाह [जलबहाव] से प्रवाह को, स्थल [सूखे स्थान] से स्थल को, सम [एक से स्थान] से सम को, सुख से सुख को, और अभय से अभय को यथावत् पाते हैं, वैसे ही यह हम संवत्सर [यज्ञ] की समाप्ति वाली ऋचा को पावें यह ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञान] है ॥ २३ ॥ भावार्थः- कोई विद्वान् सूक्ष्म से स्थूल की ओर चल कर अर्थात् कारण से कार्य का ज्ञान प्राप्त करके सुख पाते हैं और कोई स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाकर अर्थात् कार्य से कारण को खोज कर आनन्द भोगते हैं ॥ २३ ॥ कण्डिका २४ ॥ प्रेदिहं वै कौशाम्बेयः कौसुरविन्दुरुद्दालक आरुणे ब्रह्मचर्य्यमुवाच तमाचार्य्यः पप्रच्छ कुमारः कति ते पिता संवत्सरस्याहान्यमन्यते१ति कति त्वेवेति दशेति होवाच दश वा इति होवाच दशाक्षरा विराड् वैराजो यज्ञः १। कति त्वेवेति नवेति होवाच नव वा इति होवाच नव वै प्राणाः प्राणैः यज्ञस्तायते २। कति त्वेवेत्यष्टेति होवाचाष्ट वा इति होवाचाष्टाक्षरा गायत्री गायत्रो यज्ञः ३। कति त्वेवेति सप्तेति होवाच सप्त वा इति होवाच सप्त छन्दांसि छन्दोभिर्यज्ञस्तायते ४। कति त्वेवेति १ । ७ । तदधीते तद्वेद (पा० ४ । २ । ५९) अङ्गिरस्-अण्, बहुवचनस्यैक- वचनं च। आङ्गिरसाः। अङ्गानां रसवेत्तारः। स्थूलदर्शिनः (लघुभिः) सूक्ष्मैः (सामभिः) मोक्षज्ञानैः (स्पृश्यः) स्पृश सम्पर्क-क्यप्। (रथानाम्) चरणानाम् मानविशेषाणाम् (न्यन्तरम्) निश्चितव्यवधानम् (परिप्लवेते) परिप्लवन्ते। सर्वतः प्राप्नुवन्ति ॥ १. पू० सं० 'अमन्यथ' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥ १४