गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 256, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२१८ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ४ ॥ कण्डिका ४ ॥ मनुष्य शरीर के दृष्टान्त से संवत्सर यज्ञ का वृत्तान्त ॥ (पुरुषः वाव संवत्सरः) मनुष्य ही संवत्सर यज्ञ है। (तस्य प्राणः एव प्राय- णीयः अतिरात्रः, प्राणेन हि प्रयन्ति) उस [मनुष्य] का प्राण ही प्रायणीय अतिरात्र यज्ञ है, प्राण से ही आगे बढ़ते हैं। (वाक् आरम्भणीयम् अहः, यद् यत् आरभते वाक् आरभते, वाचा एव तत् आरभते) वाणी आरम्भ करने योग्य दिन [यज्ञ] है, जो जो आरम्भ किया जाता है वाणी आरम्भ करती है, वाणी से ही वह आरम्भ किया जाता है। (तस्य दक्षिणः पाणिः अयम् एव अभिप्लवः) उस [मनुष्य] का दाहिना हाथ यही अभिप्लव है। (तस्य इदं प्रातःसवनम् इदम् माध्यन्दिनं सवनं इदं तृतीयं सवनं गायत्र्याः आयतने, तस्माद् इयम् अस्यै ह्रसिष्ठा १) उस [मनुष्य] का यह प्रातःसवन [प्रातःकाल का यज्ञ अर्थात् बालकपन] यह माध्यन्दिन सवन [दोपहर का यज्ञ अर्थात् यौवन], और यह तीसरा सवन [तीसरे पहर का यज्ञ अर्थात् बुढ़ापा], गायत्री [आठ अक्षर के तीन पाद वाले गायत्री छन्द] के स्थान में है, इसलिये यह [गायत्री] इस [वाणी] में अति छोटी है। १। (तस्य इदं प्रातःसवनम् इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीय- सवनं त्रिष्टुभः आयतने, तस्मात् इयम् अस्यै वरिष्ठा २) उस [मनुष्य] का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन, यह तीसरा सवन [संख्या १ देखो] त्रिष्टुप् [ग्यारह अक्षर के चार पाद वाले त्रिष्टुप् छन्द] के स्थान में है, इसलिये यह [त्रिष्टुप्] इस [गायत्री] से अधिक बड़ा है। २। (तस्य इदं प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीयं सवनं जगत्याः आयतने, तस्मात् इयम् अनयोः वरिष्ठा ३) उस [मनुष्य] का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन, और यह तीसरा सवन [सं० १] जगती [बारह अक्षर के चार पाद वाले जगती छन्द] के स्थान में है, इसलिये यह [जगती] इन दोनों [गायत्री और त्रिष्टुप्] से अधिक बड़ा है। ३। (तस्य इदं प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीयं सवनं पङ्क्त्याः आयतने पृथुः इव वै पङ्क्तिः, तस्मात् इयम् आसां प्रतिष्ठा ४) उस [मनुष्य] का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन और यह तीसरा सवन [सं० १] पङ्क्ति [पांच वा आठ अक्षर के पांच पाद वाले पंक्ति छन्द] के स्थान में है, चौड़े पदार्थ के समान ही पङ्क्ति है, इसलिये यह [पङ्क्ति] इन [गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती] की भूमि है। ४। (तस्य इदं प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम्, इदं तृतीयसवनं विराजः आयतने, अन्नं वै श्रीः विराट्, अन्नाद्यस्य श्रियः अवरुद्ध्यै, तस्मात् इयम् आसां वरिष्ठा ५) उस ४-(आरभते) आरभ्यते (प्रातःसवनम्) बाल्यमिति यावत् (माध्य- न्दिनं सवनम्) यौवनम् (तृतीयसवनम्) वृद्धत्वम् (आयतने) स्थाने (ह्रसिष्ठा) ह्रस्व-इष्ठन्, टाप्। ह्रस्वतमा (वरिष्ठा) उरु वर वा-इष्ठन् टाप्। उरुतमा। विस्तीर्णतमा। वरतमा। श्रेष्ठतमा (पृथुः) विस्तीर्णः (प्रतिष्ठा) भूमिः। अथवा पृथु-इष्ठन्, थस्य तः। प्रथिष्ठा। अधिकविस्तीर्णा (विराट्)