गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) ६-धन्यवाद ॥ उस सर्वशक्तिमान् परमपिता जगदीश्वर को अत्यन्त धन्यवाद है जिसकी महती कृपा से अथर्व वेद भाष्य के पीछे यह गोपथब्राह्मण का भाष्य मेरे हाथ से पूरा होकर सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत है । वृद्धावस्था के कारण शरीर तो कुछ ढीला पड़ गया है, और मृत्युदेव कान में यह कहता रहता है । काल करे सो आज कर आज करे सो अब । पल में परलय होइगी फेर करेगा कब ॥ इस प्रेरणा से परमेश्वर पर भरोसा करके अन्य आवश्यकताओं से बचे समय को लगातार लगाये रहने से धीरे-धीरे यह भाष्य पूरा हो गया ॥ मैं यहाँ पर बदायूं निवासी श्रीमान् स्वामी रामभिक्षु जी महाराज को हार्दिक धन्यवाद देता हूं । उनकी प्रेरणा और विचारशीलता आदि सहायता से मेरे चित्त में उत्साह बढ़ता रहा । उक्त स्वामी जी मेरे पास वेदों का स्वाध्याय करने आये थे । जब तक वे रहे, इस भाष्य के और वेद मन्त्रों के देखने, विचारने, लिखने और मुद्रणपत्र ( Proof sheet ) शोधने तथा सूचीपत्र और अनुक्रमणिका आदि बनाने में प्रेम से मेरे सहायक हुये ॥ ७-उपसंहार प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये—अथ० १६ । ६२ । १ ॥ [ हे सर्वशक्तिमान् परमात्मन् ! ] ( मा ) मुझे ( देवेषु ) विद्वानों में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( मा ) मुझे ( राजसु ) राजाओं में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( उत ) और ( अर्ये ) वैश्यों में ( उत ) और ( शूद्रे ) शूद्रों में, और ( सर्वस्य ) प्रत्येक ( पश्यतः ) दृष्टि वाले का ( प्रियम् ) प्रिय [ बना ] ॥ हे परम पिता ! हमें पुरुषार्थ दीजिये जिससे हम वेदों के पठन-पाठन, विचार और अभ्यास से सब संसार के उपकार करने में उद्यत रहें ॥ ओ३म् । शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥ हे जगदीश्वर ! हमें एक आत्मिक शान्ति, दूसरी शारीरिक शान्ति और तीसरी सामाजिक शान्ति दीजिये ॥ क्षेमकरणदास त्रिवेदी । ५२ लूकरगंज, प्रयाग, जन्म, कार्त्तिक शुक्ला ७ संवत् १६०५ [ इलाहाबाद ] विक्रमीय [ता० ३ नवम्बर १८४८ ईस्वी] कार्त्तिकशुक्ला ७ संवत् १९८१ वि०, जन्मस्थान, ग्राम शाहपुर–मडराक, ता० ३ नवम्बर १९२४ ई०। जिला अलीगढ़ ॥