भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 600 में से

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पृष्ठ 316

२७८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० ११ ॥ एक कला वाला हो ] है । ( या उत्तरा सा कुहूः ) जो पिछली [ अमावास्या ] है वह कुहू [ जिस तिथि में चन्द्रमा की कोई कला न दीख पड़े ] है । ( चन्द्रमाः एव धाता च विधाता च ) चन्द्रमा ही [ इन तिथियों का ] धाता और विधाता [ धारण करने वाला और बनाने वाला ] है । ( यत् पूर्णः अन्यां वसत्, पूर्णः अन्यां तत् मिथुनम् ) जो पूर्ण [ चन्द्रमा ] एक [ तिथि अनुमति, शुक्ल चतुर्दशी युक्त पूर्णिमा ] में बसे, और जो दूसरी [ राका, पूरे चन्द्रमा वाली तिथि ] में [ बसे ], वह जोड़ा है । ( यत् अन्यां पश्यति, न अन्यां, तत् मिथुनम् ) जो वह [ चन्द्रमा ] एक [ सिनीवाली, कृष्णपक्ष की एक कला वाली चतुर्दशी तिथि ] में दीखे और दूसरी [ कुहू अर्थात् कृष्णपक्ष की विना चन्द्रमा वाली अमावास्या तिथि ] में न [ दीखे ], वह जोड़ा है । ( यत् अमावास्यायाः चन्द्रमाः अधि- प्रजायते तत् मिथुनम् ) जो अमावास्या से [ कुहू अर्थात् चन्द्रमा की सब कलाओं रहित तिथि से प्रतिपदा को ] चन्द्रमा दिखाई दे, वह जोड़ा है । ( तस्मात् मिथुनात् एव अस्मै पशून् प्रजनयते ) इस जोड़े से ही इस [ मनुष्य ] के लिए पशुओं [ जीवों ] को वह [ परमेश्वर ] उत्पन्न करता है ॥ १० ॥ भावार्थ :-विद्वान् लोग ज्योतिष शास्त्र से यज्ञ के लिये पौर्णमासी और अमावस के जोड़े कों जानें, क्योंकि जोड़ से ही सृष्टि उत्पन्न होती है ॥ १० ॥ कण्डिका ११ ॥ न द्वे यजेत यत् पूर्वया सम्प्रति यजेतोत्तरया छं वषट् कुर्याद्यद्युत्तरया सम्प्रति यजेत पूर्वया छं वषट् कुर्यान्नेष्टिर्भवति न यज्ञस्तदनुहोता मुख्यमुपगल्भो १जायते, एका मेव यजेत प्रगल्भो ह वै जायते न २दृत्यन्त द्वे यजेत, यज्ञमुखमेव पूर्व- यालभते यजत उत्तरया देवता एवं पूर्वयाप्नोतीन्द्रियमित्तरया देवलोकमेव पूर्वया- क्तिन् । एककलाहीनचन्द्रवती शुक्लचतुर्दशीयुक्तपूर्णिमा तिथिः (राका) कृदाधाराचि- कलिभ्यः कः ( उ० ३ । ४० ) रा दाने-कः प्रत्ययः, टाप् । योत्तरा सा राका-- निरु० ११ । २५ । राका रातेर्दानकर्मणः--निरु० ११ । ३० । सम्पूर्णचन्द्रा पौर्णमासी (अमावास्या) अमा+वस निवासे-ण्यत्, टाप् । अमा सह वसन्तः चन्द्रसूर्यौ यस्यां सा । कृष्णपक्षान्ततिथिः । अमावसी (सिनीवाली) इन्सिबृजिदीङ्भ्यश्चिभ्यो तक् ( उ० ३ । २ ) षिञ् बन्धने-नक्, ङीप्, वल संवरणे यद्वा वल जीवने दाने च-अण् ङीप् । या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली, सिनमन्नं भवति सिनाति भूतानि वालं पर्व वृणोतेस्तस्मिन्नन्नवती, वालिनीवा वाले नैवास्यामणुत्वाच्चन्द्रमाः सेवितव्यो भवतीति वा-- निरु० ११ । ३१ । चतुर्दशीयुक्ताऽमावास्या । दृष्टचन्द्रकलायुक्ताऽमावास्या । ( कुहूः) मृग्य्वादयश्च ( उ० १ । ३७ ) कुह विस्मापने-कुः, ऊङ् । योत्तरा [ अमावास्या ] सा कुहूः--निरु० ११ । ३१ कुहूर्गूहतेः क्वाभूदिति वा क्व सती हूयत इति वा क्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा-निरु० ११ । ३२ । नष्टचन्द्रकलाऽमावास्या (वसत्) लेटि रूपम् । वसेत् ॥ १. पू. सं. "अजायत" "पूर्वम्" इति पाठः ॥ २. ज. सं. अत्र 'अनादृत्य' इति पाठः ॥ सम्पा० ॥

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