गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें२८० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० १२ ॥ पीछे चन्द्रमा उदय होवे, इस [ यजमान ] के लिये इस लोक में बहुत बढ़ती होती है ॥ ११ ॥ भावार्थः--यज्ञ का प्रारम्भ और समाप्ति यथाविधि होनी चाहिये ॥ ११ ॥ कण्डिका १२ ॥ अग्नावैष्णवमेकादशकपालं निर्वपेद् दर्शपूर्णमासावारिप्समाणोऽग्निर्वै सर्वा देवता विष्णुर्यज्ञो देवताश्चैव यज्ञं चारभत ऋद्ध्या ऋध्नोत्येवोभौ सहारम्भा- वित्याहुरुदिनु शृङ्गे श्रितो मुच्यत इति दर्शो वा एतयोः पूर्वः पौर्णमास उत्तरोऽथ यत् परस्तात्पौर्णमास आरभ्यते तथया पूर्वं क्रियते तद्यत्पौर्णमासमारभमाणः सरस्वत्यै चरुं निर्वपेत्सरस्वते द्वादशकपालममावास्या वै सरस्वती पौर्णमासः सरस्वानित्युभावेवैतौ सहारभत ऋद्ध्या ऋध्नोत्येव ॥ १२ ॥ कण्डिका १२ ॥ दर्शपूर्णमास यज्ञ पर अग्नि और विष्णु तथा सरस्वती और सरस्वान् को चरु ॥ ( दर्शपूर्णमासौ आरिप्समाणः आग्नावैष्णवम् एकादशकपालं निर्वपेत् ) अमावास्या और पूर्णमासी के यज्ञ को आरम्भ करना चाहने वाला पुरुष अग्नि और विष्णु देवता वाले [ पार्थिव अग्नि और सूर्य की किरणों को शुद्ध करने वाले ] ग्यारह पात्रों में घरे हुये [ चरु ] को होम करें । ( अग्निः वै सर्वाः देवताः विष्णुः यज्ञः ) [ क्योंकि ] अग्नि ही सब देवताओं [ का रूप ] है और विष्णु यज्ञ है । ( देवताः च एव यज्ञं च आरभते, ऋध्या एव ऋध्नोति ) वह देवताओं को ही और यज्ञ को आरम्भ करता है और समृद्धि के साथ बढ़ता है । ( उभौ सहारम्भौ इति आहुः ) दोनों [अग्नि और विष्णु] साथ साथ आरम्भ होने वाले होते हैं--ऐसा कहते हैं । ( उदिनु, शृङ्गे श्रितः मुच्यते इति ) [ इसलिये ] तू ऊंचा चल, दोनों सींगों का आश्रय लिये हुये [ बैल विघ्न से ] छुट जाता है । ( एतयोः दर्शः वै पूर्वः पौर्णमासः उत्तरः ) इन दोनों में अमावास्या यज्ञ पहिले और पूर्णमासी यज्ञ पीछे है । ( अथ यत् परस्तात् पौर्णमासः आरभ्यते तत् यथा पूर्वं क्रियते ) फिर जब पौर्णमास यज्ञ पीछे से आरम्भ किया जाता है, तब पहिले के समान [ कर्म ] किया जाता है । ( तत् यत् पौर्णमासम् आरभमाणः द्वादशकपालं चरुं सरस्वत्यै सरस्वते निर्वपेत् ) सो पौर्णमास यज्ञ आरम्भ करता हुआ पुरुष बारह पात्रों में घरे हुये चरु को सरस्वती [ गतिशीला ] के लिये और सरस्वान् [ गतिशील ] के लिये होमे । ( अमावास्या वै सरस्वती, पौर्णमासः सरस्वान् इति उभौ एव एतौ १२-( अग्नावैष्णवम् ) अग्निविष्णुदेवताकम् । अग्निसूर्यदेवताकम् ( निर्वपेत् ) जुहुयात् ( आरिप्समाणः ) आ + रभ राभस्ये--सन्--शानच् । सनि मीमाघुरभलभ० ( पा० ७ । ४ । ५४ ) सनि परतः इस् इत्यादेशः । आरब्धुमिच्छन् ( ऋद्ध्या ) सम्पत्त्या ( ऋध्नोति ) वर्धते (उदिनु) उत्+इण् गतौ-लोट्, आर्षरूपम् । उदिहि । उद्गच्छ ( श्रितः ) आश्रितः ( मुच्यते ) मुक्तो बन्धनशून्यो भवति ( परस्तात् ) पश्चात् ( सरस्वत्यै ) गतिशीलायै ( सरस्वते ) गतिशीलाय ॥