भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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२९४ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २३ ॥ ऋचा ] आभिक्षा [ सेचन समर्थ वा छाछ ] है, इन्द्र ही वरुण है, वह ही जल बांटने वाला है, इसलिये वारुणी [ वरुण देवता वाली ऋचा ] आभिक्षा [ सेचन समर्थ ] है । ( अथ यत् मारुती पयस्या, अप्सु वै मरुतः श्रिताः आपः हि पयः) फिर जब मारुती [ मरुत् अर्थात् पवन देवता वाली ऋचा ] पयस्या [ जल वाली वा दधि वाली ] हैं, "आप्" अर्थात् जल में ही पवन देवता ठहरे हैं, आप् ही जल है । ( अथ इन्द्रस्य वै मरुतः श्रितः, ऐन्द्रं पयः, तस्मात् मारुती पयस्या ) फिर इन्द्र के ही आश्रित मरुत् [ पवन देवता ] हैं, इन्द्र देवता वाला जल है, इसलिये मारुती [ अर्थात् पवन देवता वाली ऋचा ] पयस्या [ जल वाली वा दधि वाली ] है । ( अथ यत् कायः एककपालः प्रजापतिः वै कः प्रजापतेः आप्त्यै) फिर जब "काय" अर्थात् प्रजापति देवता वाला एक पात्र में रक्खा हुआ चरु होता है, प्रजापति ही "क" है, प्रजापति की प्राप्ति के लिये यह [ चरु ] है । ( अथो सुखस्य वै कम् इति एतत् नामधेयं, सुखम् एव तत् अध्यात्मं धत्ते ) फिर सुख का ही "क" यह नाम है, सुख को ही उससे आत्मा में धारण करता है । ( अथ यत् मिथुनौ गावौ ददाति, तत् प्रजात्यै उक्थ्या वाजिनः रूपम् ) फिर जब जोड़ा गाय बैल का वह दान करता है, यह सन्तान उत्पन्न करने के लिये हैं, उक्थ्या [ प्रशंसनीया ऋचा ] बलवान् का रूप है । ( अथ यत् अप्सु वरुणं यजति, तत् एनं स्वे एव आयतने प्रीणाति ) फिर जब जल में वरुण को पूजता है, तब इसको अपने ही घर में तृप्त करता है । ( अथ यत् परस्तात् पौर्णमासेन यजते, तथा ह अस्य पूर्वपक्षे वरुणप्रघासैः इष्टं भवति ) फिर जब पीछे से पौर्णमास यज्ञ के साथ वरुण का यज्ञ करता है, उसी प्रकार ही उसका पहिले पखवाड़े में वरुण के हवियों से यज्ञ होता है ॥ २२ ॥ भावार्थः-यज्ञीय पदार्थों के गुण जानकर यज्ञ करने से मनुष्यों में बल और पराक्रम बढ़ता है ॥ २२ ॥ कण्डिका २३ ॥ ऐन्द्रो वा एष यज्ञक्रतुः, यत् साकमेधाः, तद्यथा महाराजः पुरस्तात् सेना- नीकानि व्यूह्याभयं पन्थानमन्वियात्, एवमेवैतत् पुरस्ताद् देवता यजन्ते, तद् यथैवादः सोमस्य महाव्रतम्, एवमेवैतदिष्टिमहाव्रतम् । अथ यदग्निमनीकवन्तं प्रथमं देवतानां यजति, अग्निर्वै देवानां मुखं, मुखत एव तद्देवान् प्रीणाति । अथ यन्माध्यन्दिने मरुतः सान्तपनान् यजति, इन्द्रो वै मरुतः सान्तपनाः, ऐन्द्रं माध्य- न्दिनं, तस्मादेनानिन्द्रेणोपसंहितान् यजति । अथ यत् सायं गृहमेधीयेन चरन्ति, न्धिनी ( आभिक्षा ) स्नुव्रश्चि० ( उ० ३ । ६६ ) आ + मिष सेचने हिंसायां च - सः, टाप् । सेचनसमर्था । दुग्धविकारः ( पयोभाजनः ) जलविभाजकः ( मारुती ) मरुत्सम्बन्धिनी ऋक् ( पयस्या ) पयस्-यत् । जलवती क्रिया ( आभिक्षा ) दुग्धविकारदध्यादि ( ऐन्द्रम् ) इन्द्रदेवताकम् ( कायः ) क-अण्, युगागमश्च । प्रजापतिदेवताकश्चरुः ( आप्त्यै ) लाभाय ( अध्यात्मम् ) आत्मनि ( मिथुनौ ) स्त्रीपुंसौ ( गावौ ) धेनुवृषभौ ( प्रजात्यै ) संतानोत्पादनाय ( उक्थ्या ) ऋक् । ( वाजिनः ) बलयुक्तस्य ( वरुणप्रघासैः ) वरुणचरुभिः ( इष्टम् ) यज्ञः ॥