गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २६ ३०३ यज्ञ ही प्रतिष्ठा [ यज्ञ की समाप्ति का व्रत ] है, वह प्रतिष्ठा [ कीर्ति ] के लिये ही है। ( अथ यत् वायुं यजति, प्राणः वै वायुः, प्राणम् एव तेन प्रीणाति ) फिर जब वायु को यज्ञ करता है, प्राण ही वायु है, प्राण को ही उससे वह तृप्त करता है। ( अथ यत् शुनासीरं यजति, संवत्सरः वै शुनासीरः, संवत्सरम् एव तेन प्रीणाति ) फिर जब शुनासीर [ सुन्दर बड़ी वीर अग्रगामी सेना वाले सेनापति इन्द्र ] को यह यज्ञ करता है, संवत्सर ही शुनासीर [ बड़े सेनापति के समान ] है, संवत्सर को ही उससे वह तृप्त करता है। ( अथ यत् सूर्य्यं यजति, असौ वै सूर्य्यः, यः असौ तपति, एतम् एव तेन प्रीणाति ) फिर जब सूर्य को यज्ञ करता है, वही सूर्य है जो वह तपाता है, इसको ही उससे वह तृप्त करता है। ( अथ यत् शेताः दक्षिणाः ददाति, एतस्य एव तत् रूपं क्रियते ) फिर जब शेता [ सूक्ष्म कर्म करने वाला यजमान ] दक्षिणावें देता है, इस [ यजमान ] का ही वह रूप किया जाता है। ( अथ यत् प्रायश्चित्तप्रतिनिधिं कुर्वन्ति, स्वस्त्ययनम् एव तत् कुर्वन्ति ) फिर जब प्रायश्चित [ पापशोधन ] रूप प्रतिनिधि यज्ञ करते हैं, स्वस्त्ययन [ स्वस्तिवाचन ] ही तब वे करते हैं, ( यज्ञस्य एव शान्तिः यजमानस्य भैषज्याय) यज्ञ की ही शान्ति यजमान की ओषधि के लिये है। ( तैः वै एतैः चातुर्मास्यैः देवाः सर्वान् कामान् सर्वाः इष्टीः सर्वम् अमृतत्वम् आप्नुवन् ) उन ही इन चातुर्मास्य यज्ञों से देवताओं ने सब कामनाओं, [ अर्थात् ] सब इष्टियों [ सत्क्रियाओं ] और सब अमरपन को पाया है। ( सः वै एषः प्रजापतिः चतुर्विंशः, यत् चातुर्मास्यानि ) वह ही यह प्रजापति चौबीस अवयव [ अर्धमास ] वाला है, जो चातुर्मास्य यज्ञ हैं, ( तस्य मुखम् एव वैश्वदेवम्, बाहू वरुणप्रघासाः, प्राणः अपानः व्यानः इति एताः तिस्रः इष्टयः, आत्मा महाहविः प्रतिष्ठा शुनासीरम् ) उस [ प्रजापति ] का मुख ही वैश्वदेव यज्ञ है, दोनों भुजायें श्रेष्ठ अन्न हैं, प्राण, अपान, व्यान यह तीन इष्टियां [ यज्ञ ] हैं, आत्मा महाहवि है, प्रतिष्ठा [ ठहराव वा आश्रय ] शुनासीर [ इन्द्र का हवि ] है। ( सः वै एषः प्रजापतिः एव संवत्सरः, यत् चातुर्मास्यानि ) वह ही यह प्रजापति ही संवत्सर है जो चातुर्मास्य हैं। ( सर्वं वै प्रजापतिः, सर्वं चातुर्मास्यानि, तत् सर्वण एव सर्वम् आप्नोति, यः एवं वेद यः च एवं विद्वान् चातुर्मास्यैः यजते चातुर्मास्यैः यजते ) सब ही प्रजापति है, सब ही चातुर्मास्य हैं, इस लिये सबके साथ ही वह सब पाता है, जो ऐसा जानता है और जो ऐसा विद्वान् चातुर्मास्य यज्ञों से यज्ञ करता है, चातुर्मास्य यज्ञों से यज्ञ करता है ॥ २६ ॥ स्थितिः । आश्रयः ( शुनासीरः, शुनासीरः ) कृशृपृकटिपटिशौटिभ्य ईरन् ( उ० ४ । ३० ) सु+णासु शब्दे-ईरन्, सस्य शः विकल्पेन । सुष्ठु नासीरम् अग्रसैन्यं यस्य सः । सेनापतिरिन्द्रः । शुनासीरौ शुनो वायुः शु अत्यन्तरिक्षे सीरः आदित्यः सरणात्- निरु० ६ । ४० ( शेता ) शित् निशाने-तृच् । सूक्ष्मकर्मा । यजमानः ( प्रायश्चित्त- प्रतिनिधिम् ) पापशोधनप्रतिनिधिरूपं यज्ञम् ( इष्टीः ) यजेः-क्तिन् । क्रियाः ( वरुणप्रघासाः ) श्रेष्ठानानि ॥