गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १० ॥ ३२६ ( तं ह स्म यत् आहुः, कस्मात् त्वम् इदम् आसन्द्याम् आसीनः सक्तुभिः उप- मथ्य सोमं पिवसि इति ) उससे जो कहते हैं—किसलिये तू अब सिंहासन पर बैठा हुआ सत्तूओं के साथ मथकर सोमरस पीता है। ( देवतासु एव यज्ञं प्रतिष्ठापयामि इति ब्राह्मणः अब्रवीत् ) देवताओं में ही यज्ञ को स्थापित करता हूं—यह ब्राह्मण [ ब्रह्मा ] कहता है। ( यस्य यस्य एवं विदुषः यज्ञे एवं विद्वान् यज्ञातंन् प्रायश्चित्तं जुहोति, देवतासु एव यज्ञं प्रतिष्ठापयति ) जिस जिस ऐसे विद्वान् के यज्ञ में ऐसा विद्वान् [ब्रह्मा] यज्ञ में पीड़ित पुरुषों के लिये प्रायश्चित्त हवन करता है, वह देवताओं में ही यज्ञ को स्थापित करता है। ( यज्ञार्ति सयोनित्वाय प्रतिजुहुयात् ) यज्ञार्ति [ यज्ञ पीड़ा वा प्रायश्चित्त ] को समान घर प्राप्ति के लिये मनुष्य करता रहे। ( त्रयस्त्रिंशत् वै यज्ञस्य तन्वः इति, एकान्नत्रिंशत् स्तोमभागाः, त्रीणि सवनानि, यज्ञः चतुर्थः ) तैंतीस [ ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, १ वाणी, १ स्वर—गो० ब्रा० उ० २ । १३ यह ३३ देवता ] ही यज्ञ के अङ्ग हैं—उनतीस स्तोम भाग [ ? ], तीन [ प्रातःसवन माध्यन्दिन सवन तृतीय सवन—गो० पू० ४ । ७ ] सवन हैं, और यज्ञ चौथा है। ( स्तोमभागैः एव एतत् स्तोमभागान् प्रतिं प्रयुङ्क्ते, सवनैः सवनानि, यज्ञेन यज्ञम् ) यह [ ब्रह्मा ] स्तोमभागों के साथ स्तोमभागों को प्रयोग में लाता है, सवनों के साथ सवनों को, यज्ञ के साथ यज्ञ को। ( सर्वाः ह वै अस्य यज्ञस्य तन्वः प्रयुक्ताः भवन्ति, सर्वाः आप्ताः सर्वाः अवरुद्धाः देवस्य सवितुः प्रसवे बृहस्पतये स्तुत इति ) सब ही इसके यज्ञ के अङ्ग प्रयोग में लाये जाते हैं, सब ही प्राप्त किये हुये, सब रक्षा किये हुये—[ देवस्य सवितुः प्रसवे ] सबके प्रकाशक और उत्पादक परमेश्वर के उत्पन्न किये संसार में [ देखो यजु० १ । १० ] और [ बृहस्पतये स्तुत ] सब विद्याओं के स्वामी परमात्मा के लिये स्तुति करो, [ इन दो को वह पढ़ता है]। ( यत् यत् वै सविता देवेभ्यः प्रासुवत् तेन आर्घ्नु वन् सवितृप्रसूताः एव स्तुवन्ति ऋध्नुवन्ति ) जो जो ही सविता [ सर्वजनक परमात्मा ] ने विद्वानों के लिये प्रेरणा की है, उससे वे बढ़े हैं, परमात्मा से प्रेरणा किये हुये ही वे स्तुति करते हैं और बढ़ते हैं। ( अस्य वै स्तोमाः ऋध्यन्ते, यज्ञः ऋध्यते, यजमानः ऋध्यते, प्रजायै ऋध्यते, पशुभ्यः ऋध्यते. ब्रह्मणे, यस्य एवं विद्वान् ब्रह्मा भवति ) उस पुरुष के स्तोम [ स्तुति योग्य व्यवहार ] बढ़ते हैं, यज्ञ बढ़ता है [ श्रीमान् होता है ], यजमान बढ़ता है, प्रजा के लिये बढ़ता है, पशुओं के लिये बढ़ता है, और अन्न वा धन के लिये [ बढ़ता है ] जिसका ऐसा विद्वान् [ जानकार ] ब्रह्मा होता है ॥ १० ॥ जुहुयात् ( सयोनित्वाय ) समानगृहत्वाय ( त्रयस्त्रिंशत् ) वसुरुद्रादित्यवाक्- स्वरास्त्रयस्त्रिंशद् देवाः—गो० ब्रा० उ० २ । १३ ( एकान्नत्रिंशत् ) एकादिश्चैकस्य- चादुक् ( पा० ६ । ३ । ७६ ) एक+न+त्रिंशत्, एकस्य अदुगागमः, दस्य नः । एकोनत्रिंशत् ( आप्ताः ) प्राप्ताः ( अवरुद्धाः ) रक्षिताः ( ऋध्नुवन्ति ) प्रवृद्धाः भवन्ति ( ऋध्यन्ते ) वर्धन्ते ( ब्रह्मणे ) ब्रह्म, अन्ननाम—निघ० २ । ७ । धननाम— निघ० २ । १० । अन्नाय । धनाय ॥