भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 600 में से

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पृष्ठ 383

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १७ ३४५ विहृत्यै यज्ञस्य विहृत्यै । प्राचीनं हि धिष्ण्येभ्यो देवानां लोकाः, प्रतीचीनं मनुष्याणाम् । तस्मात् सोमं पिबता प्राञ्चो धिष्ण्या नोपसर्प्याः । जनं ह्येतद्देवलोकं ह्यध्यारोहन्ति, तेषामेतदायतनं चोदयनं च, यदाग्नीध्रं च सदश्च । तद्योऽविद्वान् सञ्चरति, आर्त्ति- मार्च्छति । अथ यो विद्वान् सञ्चरति, न स धिष्णीयामार्त्तिमार्च्छति ॥ १७ ॥ कण्डिका १७ ॥ प्रवृत्त आहुतियों का वर्णन ॥ ( तत् आहुः, अथ कस्मात् सौम्ये एव अध्वरे प्रवृत्ताहुतीः जुह्वति न हविर्यज्ञे इति ) यह कहते हैं-फिर किस लिये सोम वाले ही यज्ञ में प्रवृत्ताहुति [ लगातार आहुतियों ] को वे देते हैं और हविर्यज्ञ में नहीं। ( अकृत्स्ना वै एषा देवयज्या, यत् हविर्यज्ञः ) [ उत्तर ] असम्पूर्ण ही यह देवयज्या है जो हविर्यज्ञ है । ( अथ ह एषा एषा एव कृत्स्ना देवयज्या, यत् सौम्यः अध्वरः, तस्मात् सौम्ये एव अध्वरे प्रवृत्ताहुतीः जुह्वति ) फिर यह ही निश्चय करके सम्पूर्ण देवयज्या है, जो सोम वाला यज्ञ है, इसलिये सोम वाले ही यज्ञ में प्रवृत्त आहुतियां वे देते हैं। ( वाचे जुष्टः भूयासम्, वाचस्पतये जुष्टः, देवि वाक् यत् वाचः मधुमत्तमम्, तस्मिन् मा धाः स्वाहा, वाचे स्वाहा, वाचस्पतये स्वाहा, सरस्वत्यै सरस्वत्यै स्वाहा इति पुरस्तात् स्वाहाकारेण जुहोति ) मैं वाणी के लिये प्रसन्न होऊँ, वाचस्पति [ वाणी के स्वामी परमात्मा ] के लिये प्रसन्न [ होऊँ ] हे देवि वाणी ! जो वाणी का अत्यन्त मधुर कर्म है उसमें मुझको स्वाहा [ सुवाणी के साथ ] धारण कर, वाणी के लिए स्वाहा [ सुन्दर वाणी वा आहुति ] है, वाचस्पति के लिये स्वाहा है, सरस्वती [ विज्ञानवती विद्या ] के लिए, सरस्वती के लिए स्वाहा है—इस मन्त्र से पहिले स्वाहा शब्द के साथ वह हवन करता है। ( तस्मात् वाक् अतः ऊर्ध्वम् उत्सृष्टा यज्ञं वहति ) इसलिए इसके उपरान्त वाणी छुटी हुई होकर यज्ञ को ले चलती है । ( मनसः अन्तरा मनसा हि मनः प्रीतम् ) मन के भीतर मन के साथ ही मन प्रसन्न रहता है । ( तत् उ ह एके सप्त आहुतीः जुह्वति, सप्त छन्दांसि प्रतिमन्त्रं प्रवृत्तानि इति वदन्तः ) फिर कोई कोई सात आहुतियां देते हैं—सात छन्द एक-एक मन्त्र में प्रवृत्त हैं— ऐसा कहते हुये । ( यथा मेखला मेध्यस्य च अमेध्यस्य च विहृत्यै पर्यस्यते, एवं ह एव एते मेध्यस्य च अमेध्यस्य च यज्ञस्य विहृत्यै विहृत्यै न्युप्यन्ते ) [ उत्तर ] जिस प्रकार मेखला [ यज्ञ सीमा ] पवित्र वस्तु के और अपवित्र वस्तु के अलग करने के लिए डाली जाती है, वैसे ही यह [ पदार्थ ] पवित्र एवं अपवित्र वस्तु के [पवित्र हुए २] यज्ञ के विस्तार के लिए, विस्तार के लिए ही [ अग्नि में ] डाले जाते हैं। ( धिष्ण्येभ्यः हि प्राचीनं देवानां लोकाः, प्रतीचीनं मनुष्याणाम्) अग्नियों से पूर्व दिशा वाला स्थान ही देवताओं के और पश्चिम १७—( जुह्वति ) प्रक्षिपन्ति ( अकृत्स्ना ) असम्पूर्णा ( जुष्टः ) प्रीतः । सेवितः ( मधुमत्तमम् ) अतिशयेन माधुर्य्ययुक्तं कर्म ( सरस्वत्यै ) विज्ञानयुक्तायै वाचे ( पुरस्तात् ) अग्रे ( उत्सृष्टा ) त्यक्ता ( प्रीतम् ) प्रसन्नम् ( मेखला ) यज्ञसीमा ( मेध्यस्य ) पवित्रपदार्थस्य ( अमेध्यस्य ) अपवित्रव्यवहारस्य ( विहृत्यै ) वि+हृञ् हरणे—क्तिन् । पृथक्करणाय । विस्ताराय ( प्राचीनम् ) पूर्वदिशि वर्तमानं स्थानम्

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