गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 404, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ३ ॥ (किं स्वित् सः यजमानस्य पापभद्रम् आद्रियेत यः अस्य वषट्कर्ता भवति, इति ह स्म आह) क्या वह यजमान का पाप वा कल्याण चाहता है जो [ ऋत्विज् ] इसका वषट् करने वाला है... ऐसा वह कहता है। (अत्र एव एनं यथा कामयेत तथा कुर्यात् ) यहां पर ही इस [ यजमान ] को जैसा चाहे वैसा वह करे। (यं कामयेत यथा एव अनीजानः अभूत् तथा एव ईजानः स्यात् इति ) जिसको वह चाहे—जैसा ही यज्ञ न करने वाला होता है वैसा ही यज्ञ करने वाला होवे। (यथा एव अस्य ऋचं ब्रूयात्, तथा एव अस्य वषट्कुर्यात्, तत् समानम् एव एनं करोति ) जिस प्रकार से ही इसकी ऋचा को वह बोले, उस प्रकार से ही इसका वषट् करे, तब इस [यजमान] को समान ही वह करता है। (यं कामयेत पापीयान् स्यात् इति उच्चैस्तराम् अस्य ऋचं ब्रूयात्, नीचैस्तरां वषट्कुर्यात्, तत् पापीयांसम् एव एनं करोति ) जिस को चाहे—यह पापी हो जावे, ऊंचे स्वर से उसकी ऋचा को बोले और नीचे स्वर से वषट् करे, तब वह इस [ यजमान ] को पापी ही करता है। (यं कामयेत श्रेयान् स्यात् इति, नीचैस्तराम् अस्य ऋचं ब्रूयात्, उच्चैस्तरां वषट्कुर्यात्, तत् श्रेयांसम् एव एनं करोति ) जिस पुरुष को वह चाहे अधिक कल्याण वाला वह होवे, नीचे स्वर से उसकी ऋचा को बोले और ऊंचे स्वर से वषट् करे, तब वह इस [ यजमान ] को कल्याण युक्त ही करता है। ( श्रिये एव, तत् एनं श्रियम् [ श्रियाम् ] आदधाति ) श्री [ सम्पति ] के लिये ही [ यह कर्म है ], तब इस [ यजमान ] को सम्पत्ति में वह स्थापित करता है ॥ ३ ॥ भावार्थः—कार्यकुशल और प्रसन्नचित्त ऋत्विज् लोग यजमान की इच्छानुसार यज्ञ को सिद्ध कर देते हैं, इसलिये यजमान उनका आदर करता रहे ॥ ३ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० ३ । ७ से मिलाओ ॥ विशेषः २—नीचे के पद ऐतरेय ब्राह्मण ३ । ७ से मिलाओ—
| गोपथ | ऐतरेय | गोपथ | ऐतरेय |
|---|---|---|---|
| ऋक्तः | रिक्तः १ ✿ | रिक्ति | रिणक्ति ✿ |
| सृत्यः | स्तुत्यः ✿ | यजमानस्य | यजमानम् ✿ |
| स यः | समः ✿ | नीचैस्तरा | नीचैस्तरां ✿ |
| अनिहाणच्छ | अनिर्हाणिच्चैः | तछिद्र्यम् | तच्छिद्र्याम् |
| स्वधामच्छत् | स धामच्छत् | ||
| (आशाम्) इच्छाम् (न) निषेधे (इयात्) प्राप्नुयात् (पापभद्रम्) पापं च | |||
| कल्याणं च (आद्रियेत) आदृतं कुर्यात् । इच्छेत् (अनीजानः) अकृतयज्ञः | |||
| (ईजानः) यज देवपूजादिषु-कानच् । कृतयज्ञः (श्रेयान्) प्रशस्य-ईयसुन् । | |||
| कल्याणवान् (श्रिये) सम्पदर्थम् (आदधाति) स्थापयति ॥ | |||
| १. पुष्पाङ्कित सभी संशोधित पद जर्मन सं० में भी ऐतरेय ब्रां० जैसे ही हैं अतः हमने मूल में | |||
| वैसा ही संशोधन बिना टिप्पणी दिये कर दिया है ॥ सम्पा० ॥ |