गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 410, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३७२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ७ अनुवषट् कुर्यात्, असंस्थितान् ऋतून् संस्थापयेत् ) जो यहां [ ऋतुयाज में ] अनुवषट् करे, बिना समाप्त हुये ऋतुओं को वह रोक देवे । ( यः तं तत्र ब्रूयात्, असंस्थितान् ऋतून् समतिष्ठिपत् दुःखम् अनुभविष्यति इति ) जो उस [ अनुवषट्कार ] को वहां बोले और बिना पूरे हुये ऋतुओं को रोक देवे, वह दुःख ही पावेगा । ( शश्वत् तथा स्यात् ) [ इसलिये यह नियम ] सदा वैसा [ अनुवषट् बिना ] होवे ॥ ७ ॥ भावार्थः-मनुष्य प्राण, अपान और व्यान की गतियों से बल और पराक्रम बढ़ाकर सब ऋतुओं को उपयोगी बनावें ॥ ७ ॥ विशेषः १-इस कण्डिका को ऐ० ब्रा० २ । २६ से मिलाओ ॥ विशेषः २-( षडतुना ) के स्थान पर ( षडृतुना ) और ( समतिष्ठिठ ) के स्थान पर ( समतिष्ठि१पत् ) पद ऐ० ब्रा० २ । २६ । में है, पहिला पद शुद्ध कर दिया है ॥ विशेषः ३-प्रतीक वाले मन्त्रों में से एक एक अर्थ सहित लिखा जाता है- १-वसन्तेन ऋतुना देवा वसवस्त्रिवृता स्तुताः । रथन्तरेण तेजसा हविरिन्द्रे वयो दधुः-यजु० २१ । २३ ॥ ( त्रिवृता ) तीनों काल में वर्तमान ( वसन्तेन ऋतुना ) वसन्त ऋतु के साथ ( स्तुताः ) स्तुति किये गये ( देवाः ) दिव्य गुण वाले ( वसवः ) पृथिवी आदि आठ वसु वा प्रथम कक्षा वाले विद्वान् लोग ( रथन्तरेण ) रथ से तरने वाले ( तेजसा ) तीक्ष्ण स्वरूप से ( इन्द्रे ) सूर्य के प्रकाश में ( हविः ) देने योग्य ( वयः ) आयु बढ़ाने हारे वस्तु को ( दधुः ) धारण करें ॥ २-सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्वसुभिः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजू रुद्रैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्रादित्यैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा । सजूर्र्ऋतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्विश्वैर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वा- नरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा-यजु० १४ । ७ ॥ [ हे स्त्री वा पुरुष ! ] ( ऋतुभिः ) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ ( सजूः ) एक सी प्रीति वा सेवा वाला, ( विधाभिः ) विविध प्रकार धारण करने वाले जलों के साथ ( सन्तताः ) अविच्छिन्नाः । निरन्तराः ( संस्था ) समाप्तिः ( असंस्थितान् ) असमाप्तान् ( संस्थापयेत् ) उपरमयेत् ( शश्वत् ) सदा । अवश्यम् ॥ १. जर्मन सं. में भी यही पाठ है अतः हमने कण्डिका में ऐसा ही रख दिया है ॥ सम्पा० ॥