गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १५ ३६१ हन्तवे शूर शत्रूनुक्थेभिष्टे वीर्या३ प्र ब्रवाम--ऋग्० १० । ११२ । १ ॥ ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य्य वाले पुरुष ] ( प्रतिकामम् ) इच्छानुसार ( सुतस्य ) निचोड़े हुये ( तत्त्वरस ] का ( पिव ) तू पान कर, ( प्रातःसावः ) प्रातःसवन का हवि ( तव हि ) तेरा ही ( पूर्वपीतिः ) प्रथम पान है। ( शूर ) हे शूर ! (शत्रून् हन्तवे ) शत्रुओं के मारने को ( हर्षस्व ) प्रसन्न हो, ( उक्थेभिः ) स्तोत्रों से ( ते वीर्या ) तेरे वीर कर्मों को ( प्र ब्रवाम ) हम कहें ॥ २--आ याहि सुषुमा हि त इन्द्र सोम पिवा इमम् । इदं बर्हिः सदो मम-- ऋग्० ८ । १७ । १ ॥ ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष ] ( आ याहि ) तू आ, ( ते हि ) तेरे लिये ही ( सोमम् ) सोम [ तत्त्वरस ] ( सुषुम ) हमने निचोड़ा है, ( इमं पिव ) इसको पी, ( मम ) मेरे ( इदं बर्हिः) इस वृद्धिकारक व्यवहार में ( आ सदः ) बैठ ॥ ३--आ नो याहि सुतावतोऽस्माकं सुष्टुतीरुप । पिवा सु शिप्रिन्नन्धसः अथर्व० २० । ४ । १, ऋग्० ८ । १७ । ४ ॥ [ हे इन्द्र राजन् ! ] ( अस्माकं सुष्टुतीः ) हमारी सुन्दर स्तुतियों को ( उप = उपेत्य ) प्राप्त होकर ( सुतवतः ) उत्तम पुत्रादि [ सन्तानों ] वाले ( नः ) हम लोगों को ( आ याहि ) आकर प्राप्त हो । ( शिप्रिन् ) हे दृढ़ जबड़े वाले ( अन्धसः ) इस अन्न रस का ( सु ) भले प्रकार ( पिव ) पान कर ॥ ४--अयमु त्वा विचर्षणे जनीरिवाभि संवृतः । प्र सोम इन्द्र स॒र्पतु--अथर्व० २० । ५ । १, ऋ० ८ । १७ । ७ ॥ (विचर्षणे ) हे दूरदर्शी ( इन्द्र ) इन्द्र ! [ परम ऐश्वर्य वाले पुरुष ] ( अयम् उ ) यह ही ( अभि ) सब प्रकार ( संवृतः ) यथा विधि स्वीकार किया हुआ ( सोमः ) सोम [ महोषधियों का रस ], ( जनीः इव ) कुल स्त्रियों के समान, ( त्वा ) तुझको ( प्र सर्पतु ) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे ॥ ५--उद् घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम् । अस्तारमेषि सूर्य--अथर्व० २० । ७ । १, ऋग्० ८ । ६३ । १, [ सायणभाष्य ] । साम० पू० २ । ४ । १ ॥ ( सूर्य ) हे सूर्य ! [ सर्वव्यापक वा सर्वप्रेरक परमेश्वर ] (श्रुतमघम्) विख्यात धन वाले, (वृषभम्) बलवान्, ( नर्यापसम् ) मनुष्यों के हितकारी कर्म वाले, ( अस्तारम् अभि ) शत्रुओं के गिराने वाले पुरुष को ( इत् ) ही ( घ ) निश्चय करके ( उद् एषि ) तू उदय होता है ॥ ६--इन्द्र ऋतुविदं सुतं सोमं हर्य पुरुष्टुत । पिवा वृषस्व तातृपिम्--अथर्व० २० । ६ । २, तथा २० । ७ । ४ ॥ ( पुरुष्टुत ) हे बहुतों से बड़ाई किये गये ( इन्द्र ) इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले सेनापति ] ( ऋतुविदम् ) बुद्धि प्राप्त कराने वाले ( तातृपिम् ) तृप्त कराने वाले, ( सुतम् ) सिद्ध किये हुये ( सोमम् ) सोम [ महोषधियों के रस ] की ( हर्य ) इच्छा कर ( पिव ) पी (आ) और (वृषस्व) बलवान् हो ॥ कण्डिका १५ ॥ इन्द्राग्नी अब्रवीत्, 'युवाञ्च इमं यज्ञस्याङ्गमनुसमाहरतमच्छावाकीयाम् । तथेत्य- ब्रूताम् । तौ सयुजौ सबलौ भूत्वा प्रासहा मृत्युमत्यैताम् । तो हास्यैतद्यज्ञस्याङ्गमनु- १. पू. सं. “युवम्” इति पाठः ॥ सम्पा० ॥