भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 433, कुल 600 में से

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पृष्ठ 433

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १६ ३९५ ४ । १८ । १, इत्यादि मन्त्रों से समाप्त करते हैं, क्योंकि वहां समवती ऋचाओं से वे समाप्त करते हैं । ( अन्तः वै पर्यासः अस्तः उदर्कः, अन्तेन एव अन्तं परिदधति ) अन्त ही पर्यास [ विराम ] है, अन्त ही उदर्क [ अवसान वा विच्छेद अर्थात् रोक ] है, अन्त के साथ ही अन्त को वे समाप्त करते हैं [ एक एक विषय पर रुक कर दूसरे को आरम्भ करके पूरा करते हैं ] । ( सर्वे मद्वतीभिः यजन्ति, यत् तत् मद्वतीभिः यजन्ति ) वे सब मद्वती [ मद् शब्द वाली ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं [ याज्या ऋचा बोलते हैं ], क्योंकि वहाँ मद्वती ऋचाओं से वे यज्ञ करते हैं । ( सर्वे सुतवतीभिः पीतवतीभिः अभिरूपाभिः यजन्ति ) वे सब सुतवती [ सुत शब्द वाली ] ऋचाओं से, पीतवती [ पीत शब्द वाली ] ऋचाओं से और अभिरूप [ विषय के अनुकूल ] ऋचाओं से यज्ञ करते हैं । [ मद्वती, सुतवती और पीतवती ऋचाओं के लिये देखो आगे ऋग्० १ । १६ । ८ । और बहुवचन शब्द होने से ब्राह्मण में समस्त इस नौ ऋचा वाले सूक्त का ग्रहण अभीष्ट है। अभिरूप शब्द से यह प्रयोजन है कि अभीष्ट देवता की स्तुति में उस देवता के सूचक पद आ जावें ] । ( यत् यज्ञे अभिरूपं, तत् समृद्धम् ) जो यज्ञ में अनुकूल [ विषय के अनुकूल कर्म ] है, वह समृद्ध है । ( सर्वे स्विष्टकृत्वा अनुवषट् कुर्वन्ति ) सब स्विष्टकृत् मन्त्र [ यदस्य कर्मणोऽत्यरीरिचं.........देखो—गो० उ० ३ । १ ] पढ़कर अनुवषट् [ समाप्ति सूचक पद ] पढ़ते हैं । ( अनुवषट्कारः स्विष्टकृतं नेत् अन्तरयाम इति ) अनुवषट्कार स्विष्टकृत् मन्त्र को कभी भी बीच [ व्यवधान ] से नहीं लेता [ स्विष्टकृत् के पीछे ही अनुवषट् होता है ] । ( अयं वै लोकः प्रातःसवनम् ) यह ही लोक प्रातःसवन है । ( तस्य पञ्च दिशः, प्रातः- सवनस्य पञ्च उक्थानि ) उस [ लोक ] की पांच दिशायें [ पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और एक ऊपर नीचे की दिश ] हैं और प्रातःसवन के पांच उक्थ [ समवती, मद्वती, सुत- वती, पीतवती और अभिरूपा ऋचाओं वाले स्तोत्र ] हैं । ( सः एतैः पञ्चभिः उक्थैः एताः पञ्च दिशः आप्नोति, एताः पञ्च दिशः आप्नोति ) वह [ यजमान ] इन पांच प्रकार वाले स्तोत्रों से इन पांच दिशाओं को पाता है ॥ १६ ॥ भावार्थः—देश और काल के विचार से जो कार्य किये जाते है, वे सब प्रकार सिद्ध होते हैं ॥ १६ ॥ विशेषः १— इस कण्डिका को मिलाओ—गो०उ० ३ । १, उ० ४ । ४ उ० ४ । १८ और ऐतरेय ब्राह्मण ३ । १२ ॥ विशेषः २—पूर्वोक्त दो मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १— समं ज्योतिः सूर्येणाह्ना रात्री समावती । कृणोमि सत्यमूतयेऽरसाः सन्तु कृत्वरीः—अथर्व० ४ । १८ । १ ॥ ( ज्योतिः ) ज्योति ( सूर्येण समम् ) सूर्य के साथ साथ और ( रात्री ) रात्रि ( अह्ना समावती ) दिन के साथ वर्तमान है, [ ऐसे ही ]

विरामः । अवसानम् । विच्छेदः (मद्वतीभिः) मद्शब्दयुक्ताभिः ऋग्भिः ( परिदधति ) समापयन्ति ( सुतवतीभिः ) सुतशब्दयुक्ताभिः ऋग्भिः ( पीतवतीभिः ) पीतशब्द- युक्ताभिः ऋग्भिः ( अभिरूपाभिः ) अनुकूलविषययुक्ताभिः ऋग्भिः ( अन्तरयाम ) आर्षरूपम् । अन्तर्याति । अन्तरेण गच्छति ॥