भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 469

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १० ४३१ प्रातःसवने, एवं माध्यन्दिने सवने, एवं तृतीयसवने, एवम् उ ह यजमानः अप्रमायुकः भवति ) जैसा ही प्रातःसवन में होवे, वैसा ही माध्यन्दिन सवन में और वैसा ही तृतीयसवन में [ बिना शीघ्रता किये ] होवे, इस प्रकार से ही यजमान बिना अचानक मृत्यु वाला होता है । ( तेन असन्त्वरमाणाः चरेयुः ) इसलिये बिना शीघ्रता किये हुये वे [ ऋत्विज् लोग अग्निष्टोम को ] करें । ( यदा वै एषः प्रातः उदेति, अथ मन्द्रतमं तपति, तस्मात् मन्द्रतमया वाचा प्रातःसवने शंसेत् ) जब ही यह [ सूर्य ] प्रातःकाल निकलता है तब वह मन्द मन्द तपता है, इसलिये अति मन्द वाणी से प्रातःसवन में वह [ स्तोत्र ] बोले । ( अथ यदा अभ्येति अथ बलीयः तपति, तस्मात् बलीयस्या वाचा माध्यन्दिने सवने शंसेत् ) फिर जब वह [ सूर्य ] ऊंचा चढ़ता है तब वह [ दोपहर को ] अधिक प्रबल तपता है, इसलिये अधिक प्रबल वाणी से माध्यन्दिन सवन में वह [ स्तोत्र ] बोले । ( अथो यद्वा अभितराम् एति, अथ बलिष्ठतमं तपति, तस्मात् बलिष्ठतमया वाचा तृतीय सवने शंसेत् ) फिर जब वह [ सूर्य दोपहर पीछे ] अत्यन्त ऊंचा चलता है, तब वह अत्यन्त प्रबल तपता है, इसलिये अत्यन्त प्रबल वाणी से तृतीय सवन में वह [ स्तोत्र ] बोले । ( एवं शंसेत्, यदि वाचः ईशीत, वाक् हि * स्त्रं. यया उत्तरण्या उत्तरया वाचा तु उत्सहेत, आसमापनायतना प्रतिपद्येत ) इस प्रकार से वह बोले कि वह वाणी पर समर्थ हो, क्योंकि वाणी शस्त्र [ स्तोत्र ] है, जिस बहुत बढ़ती हुई और अधिक ऊँची वाणी से वह उत्साही तो होवे, और समाप्ति पर्य्यन्त वह [ वाणी ] प्राप्त होवे । ( एतत् सुशस्ततरम् इव भवति ) यह ही कर्म बहुत ही प्रशंसित होता है । ( सः वै एषः न कदाचन अस्तम् अयति न उदयति ) वह ही यह [ सूर्य ] न कभी अस्त होता है और न कभी उदय होता है । ( तत् यत् एनं मन्यन्ते पश्चात् अस्तम् अयति इति ) फिर जो इस [ सूर्य ] को लोग मानते हैं कि वह पश्चिम में अस्त होता है [ सो यह बात ठीक नहीं है ] । ( तत् अह्नः एव अन्तं गत्वा अथ आत्मानं विपर्य्यस्यते, अह्नः एव अधस्तात् कृणुते रात्रीं परस्तात् ) [ क्योंकि ] तब वह [ सूर्य ] दिन के अन्त पर पहुँचकर फिर अपने को विरुद्ध प्रकार से करता है, [ अर्थात् ] वह [ सूर्य ] दिन को नीचे [अपने नीचे वा सामने ] की ओर बनाता है और रात्रि को [ पृथिवी की ] दूसरी ओर [ बनाता है ] । (सः वै एषः न कदाचन अस्तम् अयति न उदयति) वह ही यह [ सूर्य ] न कभी विस्तृतवनानि । जनशून्यस्थानानि ( अप्रमायुकः ) अपमृत्युरहितः ( मन्द्रतमम् ) मन्दतमं यथा भवति तथा ( अभ्येति ) आभिमुख्येनोर्ध्वं गच्छति ( बलीयः ) प्रबलं यथा भवति तथा ( अभितराम् ) किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे ( पा० ५।४।११) अभितर-आम् । पश्चिमाभिमुखानां पुरुषाणामत्यन्ताभिमुख्येन ( बलिष्ठतमम् ) अत्यन्तप्रबलम् ( वाचः ) वाण्याः ( ईशीत ) ईश्वरो भवेत् ( उत्त- रण्या ) उत्+तॄ तरणे-ल्युट्, ङीप् । उत्कर्षेण वर्धमानया (उत्तरया) उच्चतरया (उत्स- हेत) उत्साहवान् भवेत् (आसमापनायतना) आसंमापनात् आयतनं यस्याः सा । समाप्ति- पर्य्यन्तम् आश्रयवती वाक् (प्रतिपद्येत) प्राप्नुयात् (सुशस्ततरम्) अतिशयेन प्रशस्तम् (अस्तम्) अस्यन्ते सूर्यकिरणाः अत्र । हसिमृगृण्वामि० (उ० ३।८६) असु क्षेपणे-तन् ।