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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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४३२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ११ अस्त होता है न उदय होता है। (तत् यत् एनं मन्यन्ते पुरस्तात् उदयति इति) फिर जो उस [सूर्य] को लोग मानते हैं कि वह पूर्व में उदय होता है [सो यह ठीक नहीं है]। (तत् रात्रेः एव अन्तं गत्वा अथ आत्मानं विपर्यस्यते, रात्रिम् एव अधस्तात् कृणुते अहः परस्तात्) [क्योंकि] तब वह [सूर्य] रात्रि के अन्त पर पहुँचकर फिर अपने को विरुद्ध प्रकार से करता है, [अर्थात्] वह [सूर्य] रात्रि को [पृथिवी के] नीचे की ओर बनाता है और दिन को दूसरी ओर [अपने सामने की ओर, बनाता है। अर्थात् सूर्य एक सर्वतः प्रकाशमय घूमता हुआ गोला भूगोल से बहुत बड़ा है। भूगोल के घूमने से प्रत्येक समय पृथिवी का जो भाग सूर्य के सामने आता जाता है, वह दिन होता चला जाता है और जो भाग पीछे रहता जाता है वहाँ रात्रि होती जाती है, और सूर्य का गोला सर्वतः प्रकाशमय होने से प्रत्येक समय चमकता रहता है]। (सः वै एषः न कदाचन अस्तम् अयति न उदयति) वह ही यह [सूर्य] न कभी अस्त होता है, न कभी उदय होता है। (न ह वै कदाचन निम्लोचति एतस्य ह सायुज्यं सलोकताम् अश्नुते, यः एवं वेद) [इसलिए] वह [यजमान] कभी भी नहीं नीचे जाता है [नहीं अधोगति पाता है] और वह इस [सूर्य] के साथ सहवास और समान लोक [अवस्था] पाता है जो ऐसा जानता है॥ १०॥ भावार्थः—मनुष्य सूर्य के समान प्रतापी होकर दिन रात उन्नति का प्रयत्न करे॥१०॥ विशेषः १—इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ३।४४ से मिलाओ॥ विशेषः २—(यदि वा तः) के स्थान पर ऐ०ब्रा०से (यदि वाचः) शोधा गया है। कण्डिका ११॥ अथात एकाहास्यैव तृतीयसवनं, देवासुरा वा एषु लोकेषु समयतन्त। ते देवा असुरानभ्यजयन्। ते जिता अहोरात्रयोः सन्धिं समभ्यवागुः। स हेन्द्र उवाच, इमे वा असुरा अहोरात्रयोः सन्धिं समभ्यवागुः। कश्चाहञ्चेमानसुरानभ्युत्थास्यामहा इति। अहञ्चेत्यग्निरब्रवीन्, अहञ्चेति वरुणः, अहंचेति बृहस्पतिः, अहं चेति विष्णुः। तानभ्युत्थायाहोरात्रयोः सन्धेर्निर्जघ्नुः। यदभ्युत्थायाहोरात्रयोः सन्धेर्निर्जघ्नुः, तस्मा- दुत्था अभ्युत्थाय ह वै द्विषन्तं भ्रातृव्यं निर्हन्ति, य एवं वेद। सोऽग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय। यदग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मादाग्नेयीभिरुक्थानि प्रण- यन्ति।, यदग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मात्साकमश्वम्। यत्पञ्च देवता अभ्युत्तस्थुः, तस्मात्पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते। या वाक् सोऽग्निः, यः प्राणः स वरुणः, यन्मनः स इन्द्रः, यच्चक्षुः स बृहस्पतिः, यच्छ्रोत्रं, स विष्णुः। एते ह वा एतान् पञ्चभिः प्राणैः समीर्योदस्थापयन्१। तस्मादु ह एवैताः पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते ॥११॥ अदर्शनम्। पश्चिमाचलम् (अयति) अय गतौ-लट्। गच्छति। प्राप्नोति (उदयति) उदेति। ऊर्ध्वं गच्छति (पश्चात्) पश्चिमदिशि (अन्तम्) समाप्तिम् (गत्वा) प्राप्य (अथ) अनन्तरम् (आत्मानम्) स्वात्मानम् (विपर्य्यस्यते) विपर्य्यस्तं विरुद्धं प्रतिकूलं करोति (अधस्तात्) अधःस्थाने (परस्तात्) परस्मिन् देशे . (पुरस्तात्) पूर्वस्मिन् देशे (निम्लोचति) नि+म्रुचु म्लुचु गतौ—लट्। नीचैर्गच्छति॥ १. पू० सं० “उत्थापयन्” इति पाठः॥ सम्पा०॥