भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

१० गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ५ ॥ योग के आठ अंगों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को (नव-ऋचान्) नव [आचारो विनयो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम् । निष्ठावृत्तिस्तपो दानं नवधा कुललक्षणम्-ति शब्दकल्पद्रुमः-इन नो कुल लक्षणों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [ज्ञानों] को और (दश ऋचान्-इति) दस [दान, शील, क्षमा, वीरता, ध्यान, बुद्धि, सेना, उपाय, दूत, ज्ञान, इन दस बलों] की स्तुति योग्य विद्या वाले [वेद ज्ञानों] को [इस विषय के लिये देखो - अथर्व० १६ । २३ । २० १६. १७] (तान्) उन (अथर्वणः) अथर्वा [निश्चल] (ऋषीन्) ऋषियों [दर्शनीय वेद ज्ञानों] को (अभि अश्राम्यत्) सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्,) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः) उन दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [निश्चल वेदज्ञानों] से (दशतयान्) दस प्रकार वाले (आथर्वणान्) आथर्वण [निश्चल ब्रह्म से आये हुये] (आर्षेयान्) आर्षेयों [ऋषियो'. वेदज्ञानों में विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों] को (निर् अभिममत) उस [ब्रह्म] ने बनाया- [अर्थात्] (एकादशान्) ग्यारहवें [प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान, नाग, कूर्म्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय, दस प्राणों' के सहित ग्यारहवें जीवात्मा] से सम्बन्ध वाले, (द्वादशान्) बारहवें [चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, अग्रहायण, पौष, माघ, ग्यारह, महीनों के सहित फाल्गुन महीने] से सम्बन्ध वाले, (त्रयोदशान्) तेरहवें [उछालना, गिराना, सिकोड़ना, फैलाना, और चलना पांच कर्म-तथा छोटाई, हलकाई, प्राप्ति, स्वतन्त्रता' बड़ाई, ईश्वरपन और जिते- न्द्रियता, इन बारह के सहित तेरहवें सत्य संकल्प] से सम्बन्ध वाले (चतुर्दशान्) चौदहवें [कान, आंख नासिका जिह्वा, त्वचा-पांच ज्ञानेन्द्रिय और वाक् हाथ, पांव, पायु, उपस्थ पांच कर्मेन्द्रिय तथा मन, बुद्धि, चित्त के सहित चौदहवें अहङ्कार] से सम्बन्ध वाले, (पञ्चदशान्) पन्द्रहवें [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, और चित्र-सात रूप, तथा मधुर, अम्ल, लवण, 'कटु, कषाय और तिक्त-छह रस और चौदहवें सुरभि गन्ध के सहित पन्द्रहवें असुरभि गन्ध] से सम्बन्ध वाले, (षोडशान्) सोलहवें [प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, प्रकाश, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक इन पन्द्रह कलाओं के सहित सोलहवीं कला के नाम] से सम्बन्ध स्तुत्या विद्या येषु तान् वेदान् (द्वि-ऋचान्) सिद्धिः पूर्ववत्। द्वयोः स्थावरजङ्गमयोः स्तुत्यविद्यायुक्तान् वेदान्। तृचान्-त्रि+ऋचान्। न संप्रसारणे संप्रसारणम् (पा० ६ । १ । ३७) अत्र वार्तिकम्-ऋषि त्रैरुत्तरपदादिलोपश्छन्दसि। ऋचि परतः त्रिशब्दस्य सम्प्रसारणम्, ऋलोपश्च। ऋक्पूरबू० (पा० ५ । ४। ७४) तृच्-समासान्तः अप्रत्ययः। त्रयाणां भूतभविष्यद्वर्तमानानां स्तुत्य- विद्यायुक्तान् वेदान्। एवम् (चतुरृचान्, पञ्चर्चाम्) इत्यादि पदेषु सिद्धि- रर्थश्च योजनीयः (आथर्वणान्) तत आगतः (पा० ४ । १ । ७४) अथर्वन्- अण्। अन् (६ । ४ । १६७) इति अणि प्रकृतिभावः। अथर्वणो निश्चलात् परमे-