गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 539, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें[ बलिष्ठ यजमान ] को स्वर्गलोक में ले जाकर नहीं लौटाता है । ( मंहिताभ्यः न व्याह्वयीत, समानं हि छन्दः, अथो नेत् धाय्याः करवाणि इति ) प्रकाशित [ ऊपर जाने हुये ] त्रिष्टुभों से पहिले [ शंसावोम्-गो० उ० ३ । १६ ] व्याहाव न करे, समान ही [ सूक्तों का ] छन्द है, इससे धाय्या [ अग्नि प्रज्वलित करने की ऋचाओं ] को मैं न करूँ [ ऐसा होता कहे ] । ( यत् एनाः शंसन्ति, तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपम् ) जो वे इन [ त्रिष्टुभों ] को बोलते हैं वह स्वर्ग लोक का रूप है । ( यत् उ एव एनाः शंसन्ति, इन्द्रम् एव एतैः निह्वयन्ते यथा ऋषभं वासितायै ) जब वे इन [ त्रिष्टुभों ] को बोलते हैं, इन्द्र को ही इन [ छन्दों ] से वे बुलाते हैं, जैसे गतिमान् [ पुरुषार्थी ] को निवास करती हुई प्रजा के लिये [ बुलाते हैं ] ॥ ३ ॥ भावार्थः—कण्डिका १ के समान है ॥ ३ ॥ विशेषः १—इस कण्डिका को-ऐ० ब्रा० ६ । २१ से मिलाओ ॥ विशेषः २—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥ १—कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मत्यों दधर्षति । श्रद्धा इत्ते मघवन् पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति--ऋ० ७ । ३२ । १४, १५ ॥ यह मन्त्र आ चुका है-गो० उ० ४ । १ ॥ २-कन्नव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः । नहीन्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वगृणन्त आनशुः-ऋ० ८ । ३ । १३, १४ अथर्व० २० । ५० । १, २ ॥ ( अत- सीनाम् ) सदा चलती हुई [ सृष्टियों ] के ( तुरः ) वेग देने वाले [ परमात्मा ] के ( नव्यः ) अधिक नवीन कर्म को ( मर्त्यः ) मनुष्य ( कत् ) कैसे ( गृणीत ) बता सके ? ( नु ) क्या ( अस्य ) उसकी ( महिमानम् ) महिमा को और ( इन्द्रियम् ) इन्द्रपन [ परम ऐश्वर्य ] को ( गृणन्तः ) वर्णन करते हुये पुरुषों ने ( स्वः ) आनन्द ( नहि ) नहीं ( आनशुः ) पाया है ? ॥ ३-कदू न्वस्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम् । केनो नु कं श्रोमतेन न शुश्रुवे जनुषः परि वृत्रहा-ऋ० ८ । ६६ । ६, [ सायण भाष्य १५ ] । अथर्व० २० । ६७ । ३, साम० ८ । २ । १३ ॥ ( अस्य ) इस ( इन्द्रस्य ) इन्द्र [ बड़े ऐश्वर्य वाले वीर ] का ( नु ) अब ( कत् उ ) कौन सा ( पौंस्यम् ) पौरुष ( अकृतम् ) बिना किया हुआ (अस्ति) है ? (केनो) किस (श्रोमतेन) श्रुति [वेद] मानने वाले करके ( नु ) अब ( जनुषः परि ) जन्म से लेकर ( वृत्रहा ) शत्रुनाशक [ वीर पुरुष ] ( कम् ) सुख से ( न ) नहीं ( शुश्रुवे ) सुना गया है ॥
( पारकामाः ) परतीरगमनेच्छुकाः ( उपावर्तन्ते ) उपवर्तयते ( वीर्यवन्तम् ) सामर्थ्योपेतं यजमानम् ( मंहिताभ्यः ) महि दीप्तौ-क्तः । दीप्ताभ्यः । प्रज्ञाताभ्यः । त्रिष्टुब्भ्यः पूर्वम् ( न ) निषेधे ( व्याह्वयीत ) शंसावोम्-गो० उ० ३ । १६, इति व्याहावं कुर्यात् ( नेत् ) नैव ( ऋषभम् ) गो० उ० ५ । १५ । गतिमन्तं पुरुषार्थिनम् ( वासितायै ) गो० उ० ५ । १५ । निवासितायै प्रजायै ॥