गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 543, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६ । क० ५ ५०५ कण्डिका ५ ॥ अहीन यज्ञ की युक्ति और विमुक्ति ॥ ( अथ अतः अहीनस्य युक्तिः च विमुक्तिः च ) अब अहीन [ बहुत दिन वाले यज्ञ ] का संयोग और वियोग [ कहा जाता है ] । ( व्यन्तरिक्षमतिरत्, इति अहीनं युङ्क्ते, एवेदिन्द्रम्–इति विमुञ्चति ) व्यन्तरिक्षमतिरत्... अथर्व० २० । २८ । १, इस मन्त्र से वह अहीन यज्ञ को जोड़ता है, और एवेदिन्द्रम्.....अथर्व० २० । १२ । ६, इस मन्त्र से वह [ उसको ] अलगता है। ( नूनं सा ते—इति अहीनं युङ्क्ते, नू ष्टुतः-इति विमुञ्चति ) नूनं सा ते.....ऋ० २ । १२ । २१ आदि इस मन्त्र से वह अहीन यज्ञ को जोड़ता है, और नू ष्टुतः......ऋ० ४ । १६ । २१। इत्यादि, इस मन्त्र से वह [ उसे ] अलगता है। ( एषः ह वै अहीनं तन्तुम् अर्हति यः एनम् योक्त्रं च विमोक्त्रं च वेद ) वह ही निश्चय करके अहीन यज्ञ को फैलाने योग्य है, जो इस [ यज्ञ ] के मिलाव और अलगाव को जानता है। ( तस्य ह एषा एव युक्तिः एषा विमुक्तिः ) उस [ मनुष्य ] की यह ही युक्ति और यह ही विमुक्ति है। ( तत् यत् प्रथमे अहनि चतुर्विंशे एकाहि- कीभिः परिदध्युः, प्रथमे एव अहनि यज्ञं संस्थापयेयुः, अहीनकर्म न कुर्युः) फिर जब पहिले दिन चतुर्विंश यज्ञ में एकाहिकी [ एक दिन वाले यज्ञ की ऋचाओं ] से पूरा करें, पहिले ही दिन यज्ञ को पूरा करें और अहीन [ बहुत दिन वाले यज्ञ ] के कर्म को न करें। ( अथ यत् अहीनपरिधानीयाभिः परिदध्युः, तत् यथा युक्तः विमुच्यमानः उत्कृत्येत, एवं यजमानाः उत्कृत्येरन्, अहीनकर्म न कुर्युः) फिर जब अहीन यज्ञ की परिधानीयाओं [ समाप्ति क्रियाओं ] से पूरा करें सो जैसे जुता हुआ [ रथादि में जुता हुआ घोड़ा बहुत थकने पर ] छुटा हुआ कतर जावे [ नष्ट हो जावे ], ऐसे ही यजमान लोग कतरे जावें [ नष्ट हो जावें, इसलिये ] अहीन यज्ञ कर्म न करे। ( अथ यत् उभयीभिः परिदध्युः, तत् यथा दीर्घाध्व उपविमोकं याज्याः, तादृक् तत् समानीभिः परिदध्युः ) फिर जो दोनों प्रकार वाली [ एक दिन वाले और बहुत दिन वाले यज्ञ की ऋचाओं ] से समाप्त करें, सो जैसे लम्बे मार्ग में उपविमोक [ जगह जगह विश्राम के समान ] याज्या ऋचायें हैं, उसी प्रकार उस [ कर्म ] को एकसी ऋचाओं से पूरा करें ॥ ( तत् आहुः, एकया द्वाभ्यां वा स्तोमम् अतिशंसेत्, दीर्घारण्यानि भवन्ति, यत्र बह्वीभिः स्तोमः अतिशस्यते ) फिर कहते हैं, एक अथवा दो ऋचाओं द्वारा स्तोम अधिक बोला जावे, [ वहाँ ] बड़े बड़े वन हो जाते हैं, जहाँ बहुत सी ऋचाओं द्वारा [ स्तोम ] बढ़ाकर बोला जाता है। ( अथो क्षिप्रं देवेभ्यः अन्नाद्यं संप्रयच्छामि इति, अपरिमित्ताभिः उत्तरयोः सवनयोः ) फिर शीघ्र विद्वानों को खाने योग्य अन्न देता हूँ— ५—( युक्तिः ) संयोगः ( विमुक्तिः ) वियोगः ( युङ्क्ते ) संयोजयति ( विमुञ्चति ) वियोजयति ( योक्त्रम् ) दाम्नीशसयुयुजस्तु० ( पा० ३ । २ । १८२ ) युजिर् योगे—ष्ट्रन् । बन्धनम् (विमोक्त्रम्) गुध्वीपचिवचि० ( उ० ४ । ६७ ) मुच्ल्ऌ मोचने—त्रः । विमोचनम् (परिदध्युः) समापयेयुः ( संस्थापयेयुः ) समापयेयुः ( युक्तः ) रथयुक्तोऽश्वः ( उत्कृत्येत ) उच्छिद्येत । विनश्येत् ( उत्कृत्येरन् ) विनश्येयुः (दीर्घाध्वे) दूरमार्गे ( उपविमोकम् ) तत्र तत्र विमोचनम् ( अभिहेषते )