गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० १७ ॥ उसने ब्रह्मचर्य्य [इन्द्रियों को वश में रखना और वेदों को पढ़ना आदि तप] किया। (सः) उसने (ओम् इति एतत् अक्षरम्) ओम् इस अक्षर [कण्डिका ५] (द्विवर्णम्) दो वर्ण वाले, (चतुर्मात्रम्) चार मात्रा वाले, (सर्व्वव्यापि) सर्वव्यापक, (सर्वविभु) सर्वशक्तिमान्, (अयातयामब्रह्म) निर्विकार ब्रह्म वाले, (ब्राह्मीं व्याहृतिम्) ब्रह्म की व्याहृति. (ब्रह्मदैवतम्) ब्रह्म देवता वाले को (अपश्यत्) देखा। (तया) उस [ओम् व्याहृति] से (सर्वान् च कामान्) सब कामनाओं, (सर्वान् च लोकान्) और सब लोकों ' (सर्वान् च देवान्) और सब दिव्य पदार्थों, (सर्वान् च वेदान्) और सब वेदों, (सर्वान् च यज्ञान्) और सब यज्ञों [देवपूजा संगतिकरण दान], (सर्वान् च शब्दान्) और सब शब्दों (सर्वाः च व्युष्टीः) और सब विविध वसतियों, (सर्वाणि च स्थावरजङ्गमानि भूतानि) और सब स्थावर जङ्गम सत्ताओं को (अन्वभवत्) उस [ब्रह्म] ने बनाया। (तस्य) उस [ओम्] के (प्रथमेन वर्णेन) पहिले वर्ण [अर्थात् ओकार] से (आपः स्नेहः च.) व्यापक जल और चिकनाई को (अन्वभवत्) उसने बनाया। (तस्य द्वितीयेन वर्णेन) उसके दूसरे वर्ण [अर्थात् मकार] से (तेजः) तेज [पराक्रम] और (ज्योतींषि) ज्योतियों [प्रकाशमान पदार्थों] को (अन्वभवत्) उसने बनाया ॥ १६ ॥ भावार्थः—ब्रह्म, ब्रह्मा और ओम् परमात्मा के नाम हैं, उसने अपने सामर्थ्य से सब सृष्टि को बनाया है ॥ १६ ॥ कण्डिका १७ ॥ तस्य प्रथमया स्वरमात्रया पृथिवीमग्निमोषधिवनस्पतीन् ऋग्वेदं भूरिति व्याहृतिर्गायत्रं छन्दस्त्रिवृतं स्तोमं प्राचीं दिशं वसन्तमृतुं वाचमध्यात्मं जिह्वां रसमितीन्द्रियाण्यन्वभवत् ॥ १७ ॥ कण्डिका १७ ॥ ओम् की पहिली स्वर मात्रा से पृथिवी आदि की उत्पत्ति (तस्य) उस [ओम्] की (प्रथमया स्वरमात्रया) पहिली स्वर मात्रा [अकार] से (पृथिवीम्, अग्निम् ओषधिवनस्पतीन्) पृथिवी, अग्नि, ओषधियों, वनस्पतियों, (ब्राह्मीम्) ब्रह्मन्—अण्, ङीप्, टिलोपः। ब्रह्मसम्बन्धिनीम् (ब्रह्मदैवतम्) स्वार्थे अण्। ब्रह्मदेवतायुक्तम् (अन्वभवत्) अनुभूतवान्। अकरोत् (आपः स्नेहः च) सुपां सुलुक० (पा० ७।१।३९) द्वितीयार्थे प्रथमा। अपो व्याप्तानि जलानि स्नेहं च। (तेजः) तिज निशाने वा तेज निशाने पालने च—असुन्। उष्णस्पर्श- युक्तं द्रव्यभेदम्। प्रभावम्। पराक्रमम्, वीर्य्यम् (ज्योतींषि) द्युतेरसिन्नादेश्च जः (उ० १। ११०।) द्युत दीप्तौ—इसिन् दस्य जः। दीप्यमानान् पदार्थान् ॥ १७—'गायत्रम्) अमिनक्षियजि० (उ० ३। १०५) गै शब्दे—अत्रन्, स च णित्। आतो युक् चिण्कृतोः (पा० ७। ३।३३) इति युक्। गायत्र गायतेः