गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ेंगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २६ ॥ ४५ अपि एके ) आप् [ व्यापना ] धातु है, अवति [ रक्षा करना ] को भी कोई कोई [कहते हैं] ( रूपसामान्यात् अर्थसामान्यं नेदीयः तस्मात् आप्तेः ओंकारः सर्वम् आप्नोति इति अर्थः ) रूप की समानता [ धातु आदि की आकृति ] की अपेक्षा अर्थ की समानता अधिक निकट होती है, इसलिये आप् [ व्यापना ] धातु से ओंकार सबमे व्यापता है यह अर्थ है १ । ( कृदन्तम् अर्थवत् प्रातिपदिकम् ) कृदन्त अर्थवान् शब्द प्रातिपदिक होता है, [ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ( पा० १ । २ । ४५ ) अर्थवान् शब्द धातु और प्रत्यय को छोड़ कर प्रातिपदिक होता है ] २ ( अदर्शनं प्रत्ययस्य नाम संपद्यते) प्रत्यय के [ लोप हो जाने की ] अदर्शन संज्ञा होती है । ३ [ प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् ( पा० १ । १ । ६२ ) प्रत्यय के लोप होने पर भी प्रत्यय से होने वाला कार्य होता है ] ( निपातेषु च एनं वैयाकरणाः उदात्तं समामनन्ति ) और निपातों में इस [ ओंकार ] को व्याकरण जानने वाले लोग उदात्त मानते हैं । ( तत् अव्ययीभूतम् अन्वर्थवाची शब्दः कदाचन न व्येति इति ) सो अव्यय होता हुआ पद, अनुकूल अर्थ बताने वाला शब्द कभी भी विकार नहीं पाता है । ( सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ) तीनो लिङ्गों में और सब विभक्तियों में जो सदृश है और जो सब वचनों में विकार नहीं पाता है, वह अव्यय [ विकारशून्य निपात ] है- [स्वरादिनिपातमव्ययम् (पा० १ । १ । ३७) स्वरादि तथा निपात अव्यय हैं] (कः विकारी) कौन विकार वाला है- [ इसका उत्तर ] ( आप्नोतिः प्रसारणं च्यवते ) आप् धातु [ व्यापना ] सम्प्रसारण को पाता है [ इग्यणः सम्प्रसारणम् ( पा० १ । १ । ५ ) यण् के स्थान में इक् करने को सम्प्रसारण कहते हैं ] ( आपो अवकारौ विकार्यौ ) आकार और पकार तथा अकार और वकार दोनों विकार योग्य हैं ( आदितः ओंकारः विक्रियते द्वितीयः मकारः ) आदि में ओंकार रूपान्तर वाला होता है और मकार दूसरा वर्ण है । ( एवं द्विवर्णः एकाक्षरः ओम् इति ओंकारः निर्वृत्तः ) इस प्रकार दो वर्ण [ ओ + म् ] वाला, एक अक्षर वाला ओम् अर्थात् ओंकार सिद्ध होता है ६, १०, ११ ॥ २६ ॥ भावार्थः- इस कण्डिका में यह विचारणीय है- कौन धातु है ? उत्तर-आप् वा आप्लृ [ व्यापना ] और अव [ रक्षा आदि करना ] । ( २ ) प्रातिपदिक क्या है ? उत्तर- कृदन्त अर्थवान् शब्द प्रातिपदिक हैं-( ३ ) स्वर क्या है ? उत्तर-उदात्त । ( ४ ) निपात क्या है ? उत्तर-अव्यय होकर निपात होता है (५) विकारी क्या है ? उत्तर-आप् धातु अर्थात् आप् और अव् दोनों धातु को संप्रसारण होता है, अर्थात् आप् के पकार को बकार होकर बकार को वकार, और वकार को उकार हुआ, इसी प्रकार अव् के वकार को सम्प्रसारण उकार फिर आप् धातु के आ और उ को, और अव् के अ उ को गुण ओ, मकार प्रत्यय होकर ओम् पद सिद्ध होता है । २६-(नेदीयः) अन्तिक-ईयसुन् । अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ ( पा० ५ । ३ । ६३ ) नेदादेशः । समीपतरम् ( सम्पद्यते ) प्राप्नोति ( वैयाकरणाः ) व्याकरण + अण् । न स्वाभ्यां पदान्ताभ्याम् पूर्वौ तु ताभ्यामैच् ( पा० ७ । ३ । ३) यकारात् पूर्वमैच् । व्याकरणवेत्तारः ( समामनन्ति ) म्ना अभ्यासे । मन्यन्ते । (निर्वृत्तः) वृतु वर्तने-क्तः । निष्पन्नः । साधितः ॥