भारतकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 600 में से

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २७ ॥ ४७ है ? [ उत्तर ] ( उभो ओष्ठौ स्थानं नादानुप्रदानकरणौ च ) [ उकार और मकार के ] दोनों ओंठ स्थान हैं और दोनों नाद बढ़ाने वाले प्रयत्न हैं, (द्वयस्थानं सन्ध्यक्षरम्) दो स्थान व ला सन्धि-अक्षर होता है, (अवर्णलेशः कण्ठचः) अकार वर्णमात्र कण्ठ स्थान वाला है, (यथोक्तशेषः पूर्वः विवृतकरणस्थितः च ) और ऊपर कहे हुए [ उकार मकार ] का शेष पहिला वर्ण [ अकार ] विवृति प्रयत्न में ठहरा हुआ है, (द्वितीयः स्पृष्टकरणस्थितः च ) और दूसरा [ मकार ] स्पृष्ट प्रयत्न में ठहरा हुआ है। ६, १०, १३, १४, १५ [ कौन संयोग है, इसका उत्तर ] ( संयोगः न विद्यते ) संयोग नहीं है । [ हलोऽनन्तराः संयोगः ( पा० १ । १ । ७ ) मध्य में अच् विना हल् संयोग हो ] १६, [ कौन आख्यात है, कौन उपसर्ग है, कौन स्वर है, कौन लिङ्ग है, कौन विभक्ति है, कौन वचन है--इन छह प्रश्नों के उत्तर ] (संस्थानाध्यायिनः पूर्वे आचार्याः बभूवुः आख्यातोपसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्तिवचनानि च श्रवणात् एव प्रतिपद्यन्ते कारणं न पृच्छन्ति ) व्यवस्था विचारने वाले पहिले आचार्य हुए थे, आख्यात, उपसर्ग, अनुदात्त, स्वरित, लिंग, विभक्ति और वचन को सुनने से ही वे जान लेते हैं और कारण को नहीं पूछते । १७-२३ [ देखो कण्डिका २६ ] ( अथ अपरपक्षीयाणां कविः पञ्चालचण्डः परिपृच्छकः बभूवाम् = बभूव ) फिर दूसरे पक्ष वालों का कवि पञ्चाल देशवासियों में तीव्र मनुष्य पूंछने वाला हुआ। ( उद्गीथदोषान् तु पृथक् भवन्तः ब्रुवन्तु इति ) उद्गीथ [ उत्तम रीति से वेद गाने ] के दोषों को निश्चय करके अलग अलग अ प [ आचार्य ] लोग बतावें, (तद्व वा अपि वर्ण-अक्षर-पद-अंकशः विभक्त्याम् उपलक्षयेत् ) और वह भी वर्ण वर्ण, अक्षर अक्षर, पद पद, और अंक अंक, करके विभक्ति में बतावे । [ इसका उत्तर ] ( ऋषि- निषेवितां वाचम् स्तुवन्ति इति तस्मात् कारणं ब्रूमः ) ऋषियों की निरन्तर सेवित वाणी को लोग सराहते हैं, इसलिए हम कारण बतलाते हैं। ( वर्णानाम् अयम् इदं भविष्यति इति षडंगविदः तत् तथा अधीमहे ) वर्णों में यह वर्ण यह रूप हो जायेगा, यह षडङ्ग [ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष यह वेद के छह अङ्ग ] जानने वाले [ मानते हैं ], उसको वैसा ही हम पढ़ते हैं । ( किं छन्दः इति ) क्या छन्द है ? [ उत्तर ] ( गायत्रं हि छन्दः ) गायत्री ही छन्द है । ( देवानां गायत्री वै एकाक्षरा श्वेतवर्णा च व्याख्याता ) देवताओं की गायत्री [ पिङ्गल शास्त्र की देवी गायत्री ] एक अक्षर वाली और श्वेतवर्ण की कही गई है ॥ २४ ॥ ( द्वौ द्वादशकौ वगौ एतत् वै व्याकरणम् धात्वर्थवचनं शैक्ष्यं छन्दोवचनं च ) दो द्वादशक [ बारह बारह के ] वर्ग हैं, यह धातु और अर्थ बताने वाला, छन्द बताने पचि विस्तारे व्यक्तीकरणे च कालन् प्रत्ययः । अमन्ताड् डः ( उ० १ । ११४ ) चण दाने हिंसाने च डप्रत्ययः, यद्वा चडि कोपे-घञ् । पञ्चालेषु देशविशेषवासिषु चण्डः क्रूरनः (परिपृच्छकः) प्रच्छ जिज्ञासायां-ण्वुल् । सर्गतः प्रश्नकर्ता ( तु)

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